कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 149, कुल 182 में से
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वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३७
| जन्मजरामरणशोकाद्यनेकानर्था- | कहलाता है। जो जन्म, जरा, मरण और शोक आदि अनेक अनर्थोंसे |
|---|---|
| त्मकः प्रतिक्षणमन्यथास्वभावो | भरा हुआ, क्षण-क्षणमें अन्यथा भाव-को प्राप्त होनेवाला, माया मृगतृष्णा- |
| मायामरीच्युदकगन्धर्वनगरादि- | के जल और गन्धर्वनगरादिके समान |
| वद्दृष्टनष्टस्वरूपत्वादवसाने च | दृष्टनष्टस्वरूप होनेसे अन्तमें वृक्षके समान अभावरूप हो जानेवाला, |
| वृक्षवदभावात्मकः कदलीस्तम्भ- | केलेके खम्भेके समान निःसार और सैकड़ों पाखण्डियोंकी बुद्धिके वि- |
| वन्निःसारोऽनेकशतपाखण्डबुद्धि- | कल्पोंका आश्रय है। तत्त्वजिज्ञासु-ओंद्वारा जिसका तत्त्व 'इदम्' रूपसे |
| विकल्पास्पदस्तत्त्वविजिज्ञासुभिः | निर्धारित नहीं किया गया, वेदान्त-निर्णीत परब्रह्म ही जिसका |
| अनिर्धारितेदंतत्त्वो वेदान्तनिर्धा- | मूल और सार है, जो अविद्या काम |
| रितपरब्रह्ममूलसारोऽविद्याकाम- | कर्म और अव्यक्तरूप बीजसे उत्पन्न होनेवाला है, ज्ञान और क्रिया—ये |
| कर्माव्यक्तबीजप्रभवोऽपरब्रह्मवि- | दोनों शक्तियाँ जिसकी स्वरूपभूत हैं वह अपरब्रह्मरूप हिरण्यगर्भ ही |
| ज्ञानक्रियाशक्तिद्वयात्मकहिरण्य- | जिसका अङ्कुर है, सम्पूर्ण प्राणियों-के लिङ्गशरीर ही जिसके स्कन्ध |
| गर्भाङ्कुरः सर्वप्राणिलिङ्गभेद- | हैं, जो तृष्णारूप जलके सिंचनसे बढ़े हुए तेजवाला, बुद्धि, इन्द्रिय और |
| स्कन्धस्तृष्णाजलावसेकोद्भूत- | विषयरूप नूतन पल्लवोंके अङ्कुरों-वाला, श्रुति, स्मृति, न्याय और |
| दर्पो बुद्धीन्द्रियविषयप्रवालाङ्कुरः | ज्ञानोपदेशरूप पत्तोंवाला,यज्ञ, दान, तप आदि अनेक क्रियाकलापरूप |
| श्रुतिस्मृतिन्यायविद्योपदेश- | सुन्दर फूलोंवाला, सुख, दुःख और |
| पलाशो यज्ञदानतपआद्यनेकक्रिया- | वेदनारूप अनेक प्रकारके रसोंसे |
| सुपुष्पः सुखदुःखवेदनानेकरसः |