कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 148, कुल 182 में से
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| १३६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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तृतीया वल्ली
संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष
| तूलावधारणेनैव मूलावधारणं वृक्षस्य क्रियते लोके यथा, एवं संसारकार्यवृक्षावधारणेन तन्मूलस्य ब्रह्मणः स्वरूपावदिधारयिषयेयं षष्ठी वल्लयारभ्यते— | लोकमें जिस प्रकार तूल¹ (कार्य) का निश्चय कर लेनेसे ही वृक्षके मूलका निश्चय किया जाता है उसी प्रकार संसारकार्यरूप वृक्षके निश्चयसे उसके मूल ब्रह्मका स्वरूप निर्धारण करनेकी इच्छासे यह छठी वल्ली आरम्भ की जाती है— |
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।
एतद्वै तत् ॥ १॥
जिसका मूल ऊपरकी ओर तथा शाखाएँ नीचेकी ओर हैं ऐसा यह अश्वत्थ वृक्ष सनातन (अनादिकालीन) है। वही विशुद्ध ज्योतिःस्वरूप है, वही ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है। सम्पूर्ण लोक उसीमें आश्रित हैं; कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। यही निश्चय वह [ब्रह्म] है ॥ १ ॥
| ऊर्ध्वमूल ऊर्ध्वं मूलं यत् तद्विष्णोः परमं पदमस्येति सोऽयमव्यक्तादिस्थावरान्तः संसारवृक्ष ऊर्ध्वमूलः। वृक्षश्च व्रश्चनात्। | ऊर्ध्व (ऊपरकी ओर) अर्थात् जो वह भगवान् विष्णुका परम पद है वही जिसका मूल है ऐसा यह अव्यक्तसे स्थावरपर्यन्त संसारवृक्ष 'ऊर्ध्वमूल' है। इसका व्रश्चन—छेदन होनेके कारण यह वृक्ष |
१. 'तूल' कपासको कहते हैं। वह कपासके पौधेका कार्य है। अतः यहाँ 'तूल' शब्दसे सम्पूर्ण कार्यवर्ग उपलक्षित होता है।