भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५


| विविधेन भासा तस्य ब्रह्मणो भारूपत्वं स्वतोऽवगम्यते । न हि स्वतोऽविद्यमानं भासनमन्यस्य कर्तुं शक्यम् । घटादीनाम् अन्यावभासकत्वादर्शनाद्भासनरूपाणां चादित्यादीनां तद्दर्शनात् ॥ १५ ॥ | नाना प्रकारके प्रकाशसे उस ब्रह्मकी प्रकाशस्वरूपता स्वतः सिद्ध है, क्योंकि जिसमें स्वतः प्रकाश नहीं है वह दूसरेको भी प्रकाशित नहीं कर सकता, जैसा कि घटादिका दूसरोंको प्रकाशित करना नहीं देखा गया और प्रकाशस्वरूप आदित्यादिका दूसरोंको प्रकाशित करना देखा गया है ॥ १५ ॥ |


इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
द्वितीयाध्याये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥२॥ (५)