कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
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वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५
[ पृथक्-पृथक् भूतोंसे उत्पन्न होनेवाली ] इन्द्रियोंके जो विभिन्न भाव तथा उनकी उत्पत्ति और प्रलय हैं उन्हें जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ६ ॥
| इन्द्रियाणां श्रोत्रादीनां स्वस्वविषयग्रहणप्रयोजनेन स्वकारणेभ्य आकाशादिभ्यः पृथग् उत्पद्यमानानामत्यन्तविशुद्धात् केवलाच्चिन्मात्रात्मस्वरूपात्पृथग्भावं स्वभावविलक्षणात्मकतां तथा तेषामेवेन्द्रियाणामुदयास्तमयौ चोत्पत्तिप्रलयौ जाग्रत्स्वापाद्यवस्थापेक्षया नात्मन इति मत्वा ज्ञात्वा विवेकतो धीरो धीमान्न शोचति। आत्मनो नित्यैकस्वभावस्य अव्यभिचाराच्छोककारणत्वानुपपत्तेः। तथा च श्रुत्यन्तरं “तरति शोकमात्मवित्” (छा० उ० ७।१।३) इति ॥ ६ ॥ | अपने-अपने विषयको ग्रहण करनारूप प्रयोजनके कारण अपने कारणरूप आकाशादि भूतोंसे पृथक्-पृथक् उत्पन्न होनेवाली श्रोत्रादि इन्द्रियोंका जो अत्यन्त विशुद्धस्वरूप केवल चिन्मात्र आत्मस्वरूपसे पृथक्त्व अर्थात् स्वाभाविक विलक्षणरूपता है उसे तथा जाग्रत् और स्वप्नकी अपेक्षासे उन इन्द्रियोंके उदयास्तमय—उत्पत्ति और प्रलयको जानकर अर्थात् विवेकपूर्वक यह समझकर कि ये इन्द्रियोंकी ही अवस्थाएँ हैं, आत्माकी नहीं, धीर-बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योंकि सर्वदा एक स्वभावमें रहनेवाले आत्माका कभी व्यभिचार न होनेके कारण शोकका कोई कारण नहीं ठहरता । जैसा कि “आत्मज्ञानी शोकको पार कर जाता है” ऐसी एक श्रुति भी है ॥ ६ ॥ |
| यस्मादात्मन इन्द्रियाणां पृथग्भाव उक्तो नासौ बहिर्धि- | जिस आत्मासे इन्द्रियोंका पृथक्त्व दिखलाया गया है वह कहीं बाहर है—ऐसा नहीं समझना |