कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 160, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 160
१४८ कठोपनिषद् [ अध्याय २
| न संदृशे संदर्शनविषये न तिष्ठति प्रत्यगात्मनोऽस्य रूपम्। अतो न चक्षुषा सर्वेन्द्रियेण, चक्षुर्ग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वात् , पश्यति नोपलभते कश्चन कश्चिदप्येनं प्रकृतमात्मानम्।<br><br>कथं तर्हि तं पश्येदित्युच्यते। हृदा हृत्स्थया बुद्ध्या। मनीषा मनसः संकल्पादिरूपस्येष्टे नियन्तृत्वेनेति मनीट् तया हृदा मनीषाविकल्पयित्र्या मनसा मननरूपेण सम्यग्दर्शनेन अभिक्लृप्तोऽभिसमर्थितोऽभिप्रकाशित इत्येतत्। आत्मा ज्ञातुं शक्यत इति वाक्यशेषः। तम् आत्मानं ब्रह्मैतद्ये विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ | इस प्रत्यगात्माका रूप दृष्टिविषयमें स्थिर नहीं होता। अतः कोई भी पुरुष इस प्रकृत आत्माको चक्षुसे—सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे [ अर्थात् समस्त इन्द्रियोंमेंसे किसीसे ] भी नहीं देख सकता अर्थात् उपलब्ध नहीं कर सकता। यहाँ चक्षुका ग्रहण सम्पूर्ण इन्द्रियोंका उपलक्षण करानेके लिये है।<br><br>तो फिर उसे किस प्रकार देखे ? इसपर कहते हैं—हृदयस्थिता बुद्धिसे, जो कि सङ्कल्पादिरूप मनकी नियन्त्री होकर ईशान करनेके कारण 'मनीट्' है उस विकल्पशून्या बुद्धिसे मन अर्थात् मननरूप यथार्थदर्शनद्वारा सब प्रकार समर्थित अर्थात् प्रकाशित हुआ वह आत्मा जाना जा सकता है। यहाँ 'आत्मा जाना जा सकता है' यह वाक्यशेष है। उस आत्माको जो लोग 'यह ब्रह्म है' ऐसा जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ ९ ॥ |
|---|
| सा हन्मनीट् कथं प्राप्यत इति तदर्थो योग उच्यते— | वह हृदयस्थित [सङ्कल्पशून्य] बुद्धि किस प्रकार प्राप्त होती है ? यह बतलानेके लिये योगसाधनका उपदेश किया जाता है— |
|---|