भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 161

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९


परमपदप्राप्ति

यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥

जिस समय पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मनके सहित [ आत्मामें ] स्थित हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती उस अवस्थाको परम गति कहते हैं ॥ १० ॥

यदा यस्मिन्काले स्वविषयेभ्यो निवर्तितान्यात्मन्येव पञ्च ज्ञानानि—ज्ञानार्थत्वाच्छ्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि ज्ञानान्युच्यन्ते—अवतिष्ठन्ते सह मनसा यदनुगतानि तेन संकल्पादिव्यावृत्तेनान्तःकरणेन; बुद्धिश्चाध्यवसायलक्षणा न विचेष्टति स्वव्यापारेषु न विचेष्टते न व्याप्रियते तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥जिस समय अपने-अपने विषयोंसे निवृत्त हुई पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ—ज्ञानार्थक होनेके कारण श्रोत्रादि इन्द्रियाँ ‘ज्ञान’ कही जाती हैं—मनके साथ अर्थात् वे जिसका अनुवर्तन करनेवाली हैं उस सङ्कल्पादि व्यापारसे निवृत्त हुए अन्तःकरणके सहित [ आत्मामें ] स्थिर हो जाती हैं और निश्चयात्मिका बुद्धि भी अपने व्यापारोंमें चेष्टाशील नहीं होती—चेष्टा नहीं करती—व्यापार नहीं करती उस अवस्थाको ही परम गति कहते हैं ॥ १० ॥

तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥

उस स्थिर इन्द्रियधारणाको ही योग कहते हैं। उस समय पुरुष प्रमादरहित हो जाता है, क्योंकि योग ही उत्पत्ति और नाशरूप है ॥ ११ ॥