कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९
परमपदप्राप्ति
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥
जिस समय पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मनके सहित [ आत्मामें ] स्थित हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती उस अवस्थाको परम गति कहते हैं ॥ १० ॥
| यदा यस्मिन्काले स्वविषयेभ्यो निवर्तितान्यात्मन्येव पञ्च ज्ञानानि—ज्ञानार्थत्वाच्छ्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि ज्ञानान्युच्यन्ते—अवतिष्ठन्ते सह मनसा यदनुगतानि तेन संकल्पादिव्यावृत्तेनान्तःकरणेन; बुद्धिश्चाध्यवसायलक्षणा न विचेष्टति स्वव्यापारेषु न विचेष्टते न व्याप्रियते तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥ | जिस समय अपने-अपने विषयोंसे निवृत्त हुई पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ—ज्ञानार्थक होनेके कारण श्रोत्रादि इन्द्रियाँ ‘ज्ञान’ कही जाती हैं—मनके साथ अर्थात् वे जिसका अनुवर्तन करनेवाली हैं उस सङ्कल्पादि व्यापारसे निवृत्त हुए अन्तःकरणके सहित [ आत्मामें ] स्थिर हो जाती हैं और निश्चयात्मिका बुद्धि भी अपने व्यापारोंमें चेष्टाशील नहीं होती—चेष्टा नहीं करती—व्यापार नहीं करती उस अवस्थाको ही परम गति कहते हैं ॥ १० ॥ |
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥
उस स्थिर इन्द्रियधारणाको ही योग कहते हैं। उस समय पुरुष प्रमादरहित हो जाता है, क्योंकि योग ही उत्पत्ति और नाशरूप है ॥ ११ ॥
१५० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| १५० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तामीदृशीं तदवस्थां योगमिति मन्यन्ते वियोगमेव सन्तम्। सर्वानर्थसंयोगवियोगलक्षणा हीयमवस्था योगिनः। एतस्यां ह्यवस्थायामविद्याध्यारोपणवर्जितस्वरूपप्रतिष्ठ आत्मा। स्थिराम् इन्द्रियधारणां स्थिरामचलाम् इन्द्रियधारणां बाह्यान्तःकरणानां धारणमित्यर्थः। | उस ऐसी अवस्थाको ही—जो वास्तवमें वियोग ही है—योग मानते हैं, क्योंकि योगीकी यह अवस्था सब प्रकारके अनर्थसंयोगकी वियोगरूपा है। इस अवस्थामें ही आत्मा अपने अविद्यादि आरोपसे रहित स्वरूपमें स्थित रहता है। [उस अवस्थाको ही] स्थिर इन्द्रियधारणा कहते हैं—स्थिर अर्थात् अचल इन्द्रियधारणा यानी बाह्य और आन्तरिक करणोंको धारण करना। | | अप्रमत्तः प्रमाद्वर्जितः समाधानं प्रति नित्यं यत्नवांस्तदा तस्मिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो भवतीति सामर्थ्यादवगम्यते। न हि बुद्ध्यादिचेष्टाभावे प्रमादसंभवोऽस्ति। तस्मात्प्रागेव बुद्ध्यादिचेष्टोपरमादप्रमादो विधीयते। अथवा यदैवेन्द्रियाणां स्थिरा धारणा तदानीमेव निरङ्कुशमप्रमत्तत्वमित्यतः | तत्र—उस समय साधक पुरुष अप्रमत्त—प्रमादरहित हो जाता है, अर्थात् चित्तसमाधानके प्रति सर्वदा सयत्न रहता है; जिस समय कि वह योगमें प्रवृत्त होता है [उस समय ऐसी स्थिति होती है]—ऐसा इस वाक्यकी सामर्थ्यसे जाना जाता है, क्योंकि बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव हो जानेपर प्रमाद होना सम्भव नहीं है। अतः बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव होनेसे पूर्व ही अप्रमादका विधान किया जाता है। अथवा जिस समय भी इन्द्रियोंकी धारणा स्थिर होती है उसी समय निरङ्कुश अप्रमत्तत्व होता |
| वल्ली ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १५१ |
| वल्ली ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १५१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अभिधीयतेऽप्रमत्तस्तदा भवतीति।<br><br>कुतः ? योगो हि यस्मात् प्रभवाप्ययौ उपजनापायधर्मक इत्यर्थोऽतोऽपायपरिहारायाप्रमादः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ११ ॥ | है; इसीलिये 'उस समय अप्रमत्त हो जाता है' ऐसा कहा है। ऐसी बात क्यों है ? क्योंकि योग ही प्रभव और अप्यय यानी उत्पत्ति और लयरूप धर्मवाला है; अतः तात्पर्य यह है कि अपाय (लय) की निवृत्तिके लिये प्रमादका अभाव करना चाहिये ॥ ११ ॥ |
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बुद्ध्यादिचेष्टाविषयं चेद् ब्रह्मेदं तदिति विशेषतो गृह्येत बुद्ध्याद्युपरमे च ग्रहणकारणाभावात् अनुपलभ्यमानं नास्त्येव ब्रह्म।<br><br>यद्धि करणगोचरं तदस्तीति प्रसिद्धं लोके विपरीतं चासद् इत्यतश्चानर्थको योगः। अनुपलभ्यमानत्वाद्वा नास्तीत्युपलब्धव्यं ब्रह्मेत्येवं प्राप्त इदमुच्यते—<br><br>सत्यम्,<br>कठो० ६— | यदि ब्रह्म बुद्धि आदिकी चेष्टाका विषय होता तो 'यह वह [ब्रह्म] है' इस प्रकार विशेषरूपसे ग्रहण किया जा सकता था; किन्तु बुद्धि आदिके निवृत्त हो जानेपर तो उसे ग्रहण करनेके कारणका अभाव हो जानेसे उपलब्ध न होनेवाला वह ब्रह्म वस्तुतः है ही नहीं। लोकमें जो वस्तु इन्द्रिय-गोचर होती है वही 'है' इस प्रकार प्रसिद्ध होती है और इसके विपरीत [इन्द्रियगोचर न होनेवाली] वस्तु 'असत्' कही जाती है, अतः योग व्यर्थ है। अथवा उपलब्ध होनेवाला न होनेसे ब्रह्म 'नहीं है' इस प्रकार जानना चाहिये—ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है—<br><br>ठीक है, |
१५२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| १५२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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आत्मोपलब्धिका साधन सद्बुद्धि ही है
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥
वह आत्मा न तो वाणीसे, न मनसे और न नेत्रसे ही प्राप्त किया जा सकता है; वह 'है' ऐसा कहनेवालोंसे अन्यत्र (भिन्न पुरुषोंको) किस प्रकार उपलब्ध हो सकता है ? ॥ १२ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नैव वाचा न मनसा चक्षुषा नान्यैरपीन्द्रियैः प्राप्तुं शक्यत इत्यर्थः । तथापि सर्वविशेषरहितोऽपि जगतो मूलम् इत्यवगतत्वादस्त्येव कार्यप्रविलापनस्य अस्तित्वनिष्ठत्वात् । तथा हीदं कार्यं सूक्ष्मतारतम्यपारम्पर्येणानुगम्यमानं सद्बुद्धिनिष्ठामेवावगमयति । यदापि विषयप्रविलापनेन प्रविलाप्यमाना बुद्धिस्तदापि सा सत्प्रत्ययगर्भैव विलीयते । बुद्धिर्हि नः प्रमाणं सदसतोर्याथात्म्यावगमे । | तात्पर्य यह कि वह ब्रह्म न तो वाणीसे, न मनसे, न नेत्रसे और न अन्य इन्द्रियोंसे ही प्राप्त किया जा सकता है । तथापि सर्वविशेषरहित होनेपर भी 'वह जगत्का मूल है' इस प्रकार ज्ञात होनेके कारण वह है ही, क्योंकि कार्यका विलय किसी अस्तित्वके आश्रयसे ही हो सकता है । इसी प्रकार सूक्ष्मताकी तारतम्यपरम्परासे अनुगत होनेवाला यह सम्पूर्ण कार्यवर्ग भी सद्बुद्धिनिष्ठाको ही सूचित करता है । जिस समय विषयका विलय करते हुए बुद्धिका विलय किया जाता है उस समय भी वह सद्वृत्तिगर्भीता हुई ही लीन होती है । तथा सत् और असत्का यथार्थ स्वरूप जाननेमें तो हमारे लिये बुद्धि ही प्रमाण है । |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५३
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५३
| मूलं चेज्जगतो न स्यादसद्न्वितमेवेदं कार्यमसदित्येवं गृह्येत न त्वेतदस्ति सत्सदित्येव तु गृह्यते; यथा मृदादिकार्यं घटादि मृदाद्यन्वितम् । तस्माज्जगतो मूलमात्मास्तीत्येवोपलब्धव्यः । कस्मात् ? अस्तीति ब्रुवतोऽस्तित्ववादिन आगमार्थानुसारिणः श्रद्दधानादन्यत्र नास्तिकवादिनि नास्ति जगतो मूलमात्मा निरन्वयमेवेदं कार्यमभावान्तं प्रविलीयत इति मन्यमाने विपरीतदर्शिनि कथं तद्ब्रह्म तत्त्वत उपलभ्यते न कथञ्चनोपलभ्यत इत्यर्थः ॥ १२ ॥ | यदि जगत्का कोई मूल न होता तो यह सम्पूर्ण कार्यवर्ग असन्मय ही होनेके कारण 'असत् है' इस प्रकार ग्रहण किया जाता । किन्तु ऐसी बात नहीं है; यह जगत् तो 'है-है' इस प्रकार ही ग्रहण किया जाता है, जिस प्रकार कि मृत्तिका आदिके कार्य घट आदि [अपने कारण] मृत्तिका आदिसे समन्वित ही गृहीत होते हैं । अतः जगत्का मूल आत्मा 'है' इस प्रकार ही उपलब्ध किया जाना चाहिये । क्यों ? क्योंकि आत्मा 'है' इस प्रकार कहनेवाले शास्त्रार्थानुसारी श्रद्धालु आस्तिक पुरुषोंसे भिन्न नास्तिकवादियोंको, जो ऐसा मानते हैं कि 'जगत्का मूल आत्मा नहीं है, जिसका अभाव ही अन्तिम परिणाम है ऐसा यह कार्यवर्ग कारणसे अनन्वित हुआ ही लीन हो जाता है'—ऐसे उन विपरीतदर्शियोंको वह ब्रह्म किस प्रकार तत्त्वतः उपलब्ध हो सकता है ? अर्थात् किसी प्रकार उपलब्ध नहीं हो सकता ॥ १२ ॥ |
| तस्मादपोहासद्वादिपक्षम् आसुरम्— | अतः असद्वादियोंके आसुरी पक्षका निराकरण कर— |
१५४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
१५४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥
वह आत्मा 'है' इस प्रकार ही उपलब्ध किया जाना चाहिये तथा उसे तत्त्वभावसे भी जानना चाहिये । इन दोनों प्रकारकी उपलब्धियोंमेंसे जिसे 'है' इस प्रकारकी उपलब्धि हो गयी है तत्त्वभाव उसके अभिमुख हो जाता है ॥ १३ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाषानुवाद |
|---|---|
| अस्तीत्येवात्मोपलब्धव्यः <br><br> सत्कार्यो बुद्ध्याद्युपाधिः । यदा तु तद्रहितोऽविक्रिय आत्मा कार्यं च कारणव्यतिरेकेण नास्ति "वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्" (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेस्तदा यस्य निरुपाधिकस्यालिङ्गस्य सदसदादिप्रत्ययविषयत्ववर्जितस्यात्मनः तत्त्वभावो भवति तेन च रूपेण आत्मोपलब्धव्य इत्यनुवर्तते । <br><br> तत्राप्युभयोः सोपाधिकनिरुपाधिकयोरस्तित्वतत्त्वभावयोः— | बुद्धि आदि जिसकी उपाधि हैं तथा जिसका सत्त्व उसके कार्य-वर्गमें अनुगत है उस आत्माको 'है' इस प्रकार ही उपलब्ध करना चाहिये। जिस समय आत्मा उस बुद्धि आदि उपाधिसे रहित और निर्विकार जाना जाता है तथा कार्यवर्ग "विकार वाणीका विलास और नाममात्र है, केवल मृत्तिका ही सत्य है" इस श्रुतिके अनुसार अपने कारणसे भिन्न नहीं है—ऐसा निश्चित होता है उस समय जिस निरुपाधिक अलिंग और सत्-असत् आदि प्रतीतिके विषयत्वसे रहित आत्माका तत्त्वभाव होता है उस तत्त्वस्वरूपसे ही आत्माको उपलब्ध करना चाहिये—इस प्रकार यहाँ 'उपलब्धव्य' पदकी अनुवृत्ति की जाती है। <br><br> सोपाधिक अस्तित्व और निरुपाधिक तत्त्वभाव इन दोनोंमेंसे— |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५
| निर्धारणार्था षष्ठी—पूर्वमस्तीत्ये<br>वोपलब्धस्यात्मनः सत्कार्योपाधि-<br>कृतास्तित्वप्रत्ययेनोपलब्धस्य<br>इत्यर्थः पश्चात्प्रत्यस्तमित-<br>सर्वोपाधिरूप आत्मनस्तत्त्वभावो<br>विदिताविदिताभ्यामन्योऽद्वयस्व-<br>भावो "नेति नेति" (बृ० उ० २ ।<br>३ । ६, ३ । ९ । २६) इति<br>"अस्थूलमण्वह्रस्वम्" (बृ०<br>उ० ३ । ८ । ८) "अदृश्येऽनात्म्ये-<br>ऽनिरुक्तेऽनिलयने" (तै० उ० २ ।<br>७ । १) इत्यादिश्रुतिनिर्दिष्टः<br>प्रसीदत्यभिमुखीभवति आत्म-<br>प्रकाशनाय पूर्वमस्तीत्युपलब्ध-<br>वत इत्येतत् ॥ १३ ॥ | यहाँ 'उभयोः' इस पदमें षष्ठी<br>निर्धारणके लिये है—पहले तो 'है'<br>इस प्रकार उपलब्ध हुए आत्माका<br>अर्थात् सत्कार्यरूप उपाधिके किये<br>हुए अस्तित्व-प्रत्ययसे उपलब्ध हुए<br>आत्माका और फिर जिसकी सम्पूर्ण<br>उपाधि निवृत्त हो गयी है और जो ज्ञात<br>एवं अज्ञातसे भिन्न अद्वितीयस्वरूप<br>है, उस "नेति-नेति"¹ "अस्थूल-<br>मण्वह्रस्वम्"² "अदृश्येऽनात्म्येऽ-<br>निरुक्तेऽनिलयने"³ इत्यादि श्रुतियोंसे<br>निर्दिष्ट आत्माका तत्त्वभाव 'प्रसीदति'—<br>अभिमुख होता है अर्थात् जिसे पहले<br>'है' इस प्रकार आत्माकी उपलब्धि<br>हो गयी है उसे अपना स्वरूप प्रकट<br>करनेके लिये [वह तत्त्वभाव अभि-<br>मुख प्रकाशित होता है] ॥ १३ ॥ |
अमर कब होता है ?
| एवं परमार्थदर्शिनोः— | इस प्रकार परमार्थदर्शीकी— |
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यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥
१. 'यह (स्थूल) नहीं है, यह (सूक्ष्म) नहीं है।'
२. 'अस्थूल, असूक्ष्म, अह्रस्व।'
३. 'अदृश्य (इन्द्रियोंके अविषय) में, अनात्म्य (अहंता-ममताहीन) में, अनिर्वचनीयमें, अनिलयन (आधाररहित) में।'
१५६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| १५६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ, जो कि इसके हृदयमें आश्रय करके रहती हैं, छूट जाती हैं उस समय वह मर्त्य (मरणधर्मा) अमर हो जाता है और इस शरीरसे ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥
| [कामत्यागेन अमृतत्वम्]<br><br>यदा यस्मिन्काले सर्वे कामाः कामयितव्यस्यान्यस्याभावात्प्रमुच्यन्ते विशीर्यन्ते येऽस्य प्राक्प्रतिबोधाद्विदुषो हृदि बुद्धौ श्रिता आश्रिताः । बुद्धिर्हि कामानामाश्रयो नात्मा । “कामः संकल्पः” (बृ० उ० १ । ५ । ३) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च ।<br><br>अथ तदा मर्त्यः प्राक्प्रबोधात् आसीत्स प्रबोधोत्तरकालमविद्याकामकर्मलक्षणस्य मृत्योर्विनाशादमृतो भवति । गमनप्रयोजकस्य मृत्योर्विनाशाद्गमनानुपपत्तेरत्रैहैव प्रदीपनिर्वाणवत्सर्वबन्धनोपशमाद्ब्रह्म समश्नुते ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १४ ॥ | जब—जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ कामनायोग्य अन्य पदार्थका अभाव होनेके कारण छूट जाती हैं—छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जो कि बोध होनेसे पूर्व इस विद्वान्के हृदय—बुद्धिमें आश्रित रहती हैं—क्योंकि बुद्धि ही कामनाओंका आश्रय है, आत्मा नहीं; जैसा कि “कामना, संकल्प [और संशय—ये सब मन ही हैं]” इत्यादि एक दूसरी श्रुतिसे भी सिद्ध होता है।<br><br>तब फिर जो आत्मसाक्षात्कारसे पूर्व मरणधर्मा था वह जीव आत्मज्ञान होनेके अनन्तर अविद्या, कामना और कर्मरूप मृत्युका नाश हो जानेसे अमर हो जाता है । परलोकमें गमन करानेवाले मृत्युका विनाश हो जानेसे वहाँ जाना सम्भव न होनेके कारण वह इस लोकमें ही दीपनिर्वाणके समान सम्पूर्ण बन्धनोंके नष्ट हो जानेसे ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है, अर्थात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ १४ ॥ |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
| कदा पुनः कामानां मूलतो विनाश इत्युच्यते- | परन्तु कामनाओंका समूल नाश कब होता है ? इसपर कहते हैं— |
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यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥ १५ ॥
जिस समय इस जीवनमें ही इसके हृदयकी सम्पूर्ण ग्रन्थियोंका छेदन हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस सम्पूर्ण वेदान्तोंका इतना ही आदेश है ॥ १५ ॥
| [ग्रन्थिभेद एवामृतत्वम्]<br><br>यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते भेदम् उपयान्ति विनश्यन्ति हृदयस्य बुद्धेरिह जीवत एव ग्रन्थयो ग्रन्थिवद् दृढबन्धनरूपा अविद्याप्रत्यया इत्यर्थः । अहमिदं शरीरं ममेदं धनं सुखी दुःखी चाहम् इत्येवमादिलक्षणास्तद्विपरीतब्रह्मात्मप्रत्ययोपजननादब्रह्मैवाहमस्म्यसंसारीति विनष्टेष्वविद्याग्रन्थिषु तन्निमित्ताः कामा मूलतो विनश्यन्ति । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयेतावदेवैतावन्मात्रं नाधिकमस्तीत्याशङ्का कर्तव्या— | जिस समय यहाँ—जीवित रहते हुए ही इसके हृदयकी—बुद्धिकी सम्पूर्ण ग्रन्थियाँ अर्थात् दृढ बन्धनरूप अविद्याजनित प्रतीतियाँ छिन्न-भिन्न होतीं—भेदको प्राप्त होतीं अर्थात् नष्ट हो जाती हैं—'मैं यह शरीर हूँ, यह मेरा धन है, मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ' इत्यादि प्रकारके अनुभव अविद्या-प्रत्यय हैं; उसके विपरीत ब्रह्मात्मभावके अनुभवकी उत्पत्तिसे 'मैं असंसारी ब्रह्म ही हूँ' ऐसे बोधद्वारा अविद्यारूप ग्रन्थियोंके नष्ट हो जानेपर उसके निमित्तसे हुई कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं। तब वह मर्त्य (मरणधर्मा जीव) अमर हो जाता है। बस इतना ही सम्पूर्ण वेदान्तोंका अनुशासन—आदेश है; इससे अधिक कुछ और |
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१५८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| १५८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| अनुशासनमनुशिष्टिरुपदेशः। सर्व-वेदान्तानामिति वाक्यशेषः ॥१५॥ | है ऐसी आशङ्का नहीं करनी चाहिये। यहाँ 'सर्ववेदान्तानाम्' यह वाक्यशेष है ॥ १५॥ |
| निरस्ताशेषविशेषव्यापि-ब्रह्मात्मप्रतिपत्त्या प्रभिन्नसमस्ता-विद्यादिग्रन्थेर्जीवत एव ब्रह्मभूतस्य विदुषो न गतिर्विद्यत इत्युक्तमत्र ब्रह्म समश्नुत इत्युक्तत्वात् । “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति” (बृ० उ० ४।४।६) इति श्रुत्यन्तराच्च ।<br><br>ये पुनर्मन्दब्रह्मविदो विद्या-न्तरशीलिनश्च ब्रह्मलोकभाजो ये च तद्विपरीताः संसारभाजः तेषामेव गतिविशेष उच्यते— प्रकृतोत्कृष्टब्रह्मविद्याफलस्तुतये । | जिसमें सम्पूर्ण विशेषणोंका अभाव है उस सर्वव्यापक ब्रह्मको ही अपने आत्मस्वरूपसे जान लेनेके कारण जिसकी अविद्या आदि समस्त ग्रन्थियाँ टूट गयी हैं और जो जीवितावस्थामें ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया है उस विद्वान्का कहीं गमन नहीं होता—ऐसा पहले कहा गया, क्योंकि [चौदहवें मन्त्रमें] 'इस शरीरमें ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है'—ऐसा कहा है। "उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते वह ब्रह्मरूप हुआ ही ब्रह्ममें लीन हो जाता है" इस एक दूसरी श्रुतिसे भी यही निश्चय होता है।<br><br>किन्तु जो मन्द ब्रह्मज्ञानी और अन्य विद्या (उपासना) का परिशीलन करनेवाले ब्रह्मलोक-प्राप्तिके अधिकारी हैं अथवा जो उनसे विपरीत [जन्म-मरणरूप] संसारको ही प्राप्त होनेवाले हैं, उन्हींकी किसी गतिविशेषका वर्णन यहाँ प्रकरणप्राप्त ब्रह्मविद्याके उत्कृष्ट फलकी स्तुतिके लिये किया जाता है। |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९
| किं चान्यदग्निविद्या पृष्टा प्रत्युक्ता च। तस्याश्च फलप्राप्तिप्रकारो वक्तव्य इति मन्त्रारम्भः। तत्र— | इसके सिवा नचिकेताके पूछनेपर यमराजने पहले अग्निविद्याका भी वर्णन किया था; उस अग्निविद्याके फलकी प्राप्तिका प्रकार भी बतलाना है ही। इसी अभिप्रायसे इस मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। वहाँ [कहना यह है कि—] |
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शतं चैका च हृदयस्य नाड्य- स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥
इस हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं; उनमेंसे एक मूर्धाका भेदन करके बाहरको निकली हुई है। उसके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर गमन करनेवाला पुरुष अमरत्वको प्राप्त होता है। शेष विभिन्न गतियुक्त नाड़ियाँ उत्क्रमण (प्राणोत्सर्ग) की हेतु होती हैं ॥ १६ ॥
| [सुषुम्नाभेदेन अमृतत्वम्]<br><br>शतं च शतसंख्याका एका च सुषुम्ना नाम पुरुषस्य हृदयाद्विनिःसृता नाड्यः शिरास्तासां मध्ये मूर्धानं भित्त्वाभिनिःसृता निर्गता सुषुम्ना नाम। तयान्तकाले हृदय आत्मानं वशीकृत्य योजयेत्।<br><br>तया नाड्योर्ध्वमुपर्य्यायन् गच्छन्नादित्यद्वारेणामृतत्वममरण- | पुरुषके हृदयसे सौ अन्य और सुषुम्ना नामकी एक—इस प्रकार [एक सौ एक] नाडियाँ—शिराएँ निकली हैं। उनमें सुषुम्ना नाम्नी नाडी मस्तकका भेदन करके बाहर निकल गयी है। अन्तकालमें उसके द्वारा आत्माको अपने हृदयदेशमें वशीभूत करके समाहित करे।<br><br>उस नाडीके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर जानेवाला जीव सूर्यमार्गसे अमृतत्व—आपेक्षिक अमरणधर्मत्व- |
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१६० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| १६० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| धर्मत्वमापेक्षिकम् । “आभूतसं-<br>प्लवं स्थानममृतत्वं विभाव्यते”<br>(वि० पु० २ । ८ । ९७)<br>इति स्मृतेः । ब्रह्मणा वा सह<br>कालान्तरेण मुख्यममृतत्वमेति<br>भुक्त्वा भोगाननुपमान्ब्रह्मलोक-<br>गतान् । विष्वङ्नानाविधगतयः<br>अन्या नाड्य उत्क्रमणे निमित्तं<br>भवन्ति संसारप्रतिपत्त्यर्था एव<br>भवन्तीत्यर्थः ॥ १६ ॥ | को प्राप्त हो जाता है, जैसा कि<br>“सम्पूर्ण भूतोंके क्षयपर्यन्त रहने-<br>वाला स्थान अमृतत्व कहलाता है”<br>इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है ।<br>अथवा [ यह भी तात्पर्य हो सकता<br>है कि ] कालान्तरमें ब्रह्माके साथ<br>ब्रह्मलोकके अनुपम भोगोंको भोगकर<br>मुख्य अमृतत्वको प्राप्त करता है ।<br>इसके सिवा जिनकी गति विविध<br>भाँतिकी हैं ऐसी अन्य सब नाड़ियाँ<br>प्राणप्रयाणकी हेतु होती हैं, अर्थात्<br>वे संसारप्राप्तिके लिये ही होती<br>हैं ॥ १६ ॥ |
| इदानीं सर्ववल्ल्यर्थोपसंहा-<br>रार्थमाह— | अब सम्पूर्ण वल्लियोंके अर्थका<br>उपसंहार करनेके लिये कहते हैं— |
उपसंहार
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥
अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जो अन्तरात्मा है सर्वदा जीवोंके हृदयदेशमें स्थित है । मूँजसे सींकके समान उसे धैर्यपूर्वक अपने शरीरसे बाहर निकाले [ अर्थात् शरीरसे पृथक् करके अनुभव करे ] । उसे शुक्र ( शुद्ध ) और अमृतरूप समझे, उसे शुक्र और अमृतरूप समझे ॥ १७ ॥
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६१
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६१
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरा-<br>त्मा सदा जनानां सम्बन्धिनि<br>हृदये संनिविष्टो यथाव्याख्यातः<br>तं स्वादात्मीयाच्छरीरात्प्रवृहेत्<br>उद्यच्छेन्निष्कर्षेत्पृथक्कुर्यादित्यर्थः।<br>किमिवेत्युच्यते मुञ्जादिव<br>इषीकामन्तस्थां धैर्येणाप्रमादेन ।<br>तं शरीरान्निष्कृष्टं चिन्मात्रं विद्या-<br>द्विजानीयाच्छुक्रममृतं यथोक्तं<br>ब्रह्मेति । द्विर्वचनमुपनिषत्परि-<br>समाप्त्यर्थमितिशब्दश्च ॥१७॥ | अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जिसकी व्याख्या पहले (क० उ० २ । १ । १२-१३ में) की जा चुकी है और जो जीवोंके हृदयमें स्थित उनका अन्तरात्मा है उसे अपने शरीरसे बाहर करे—ऊपर नियन्त्रित करे—निकाले अर्थात् शरीरसे पृथक् करे । किस प्रकार पृथक् करे? इसपर कहते हैं—धैर्य अर्थात् अप्रमादपूर्वक इस प्रकार अलग करे जैसे मूँजसे उसके भीतर रहनेवाली सींक की जाती है। शरीरसे पृथक् किये हुए उस (अङ्गुष्ठमात्र पुरुष) को ही पूर्वोक्त चिन्मात्र विशुद्ध और अमृतमय ब्रह्म जाने। यहाँ 'तं विद्याच्छुक्रममृतम्' इस पदकी द्विरुक्ति और 'इति' शब्द उपनिषद्की समाप्तिके लिये हैं ॥ १७ ॥ |
| विद्यास्तुत्यर्थोऽयमाख्यायि-<br>कार्थोपसंहारोऽधुनोच्यते— | अब विद्याकी स्तुतिके लिये यह आख्यायिकाके अर्थका उपसंहार कहा जाता है— |
मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा
विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्यु-
रन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥
१६२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| १६२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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मृत्युकी कही हुई इस विद्या और सम्पूर्ण योगविधिको पाकर नचिकेता ब्रह्मभावको प्राप्त, विरज (धर्माधर्मशून्य) और मृत्युहीन हो गया। दूसरा भी जो कोई अध्यात्म-तत्त्वको इस प्रकार जानेगा वह भी वैसा ही हो जायगा ॥ १८ ॥
| मृत्युप्रोक्तां यथोक्तामेतां ब्रह्मविद्यां योगविधिं च कृत्स्नं समस्तं सोपकरणं सफलमित्येतत्; नचिकेता वरप्रदानान्मृत्योर्लब्ध्वा प्राप्येत्यर्थः—किम् ? ब्रह्मप्राप्तोऽभून्मुक्तोऽभवदित्यर्थः। कथम् ? विद्याप्राप्त्या विरजो विगतधर्माधर्मो विमृत्युर्विगतकामाविद्यश्च सन्पूर्वमित्यर्थः। | मृत्युकी कही हुई इस पूर्वोक्त ब्रह्मविद्या और कृत्स्न—सम्पूर्ण योग-विधिको, उसके साधन और फलके सहित, वरप्रदानके कारण मृत्युसे प्राप्त कर नचिकेता, क्या हो गया ? [इसपर कहते हैं] ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया, अर्थात् मुक्त हो गया । सो किस प्रकार ? [इसपर कहते हैं—] विद्याकी प्राप्तिद्वारा पहले विरज—धर्माधर्मसे रहित और विमृत्यु—काम और अविद्यासे रहित होकर [ मुक्त हो गया ] ऐसा इसका तात्पर्य है । |
| न केवलं नचिकेता एव अन्योऽपि नचिकेतोवदात्मविद् अध्यात्ममेव निरुपचरितं प्रत्यक्स्वरूपं प्राप्य तत्त्वमेवेत्यभिप्रायः, नान्यद्रूपमप्रत्यग्रूपम् । तदेवमध्यात्ममेवमुक्तप्रकारेण वेद विजानातीत्येवंवित्सोऽपि विरजः | केवल नचिकेता ही नहीं, बल्कि नचिकेताके समान जो दूसरा भी आत्मज्ञानी है अर्थात् जो अपने देहादिके अधिष्ठाता उपचारशून्य प्रत्यक्स्वरूपको—यही तत्त्व है, अन्य अप्रत्यक्रूप नहीं—ऐसा जानता है, जो उक्त प्रकारसे अपने उसी अध्यात्मरूपको जानता है अर्थात् जो उसी प्रकार जाननेवाला है वह भी विरज (धर्माधर्मसे |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६३
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६३
| सन्ब्रह्मप्राप्त्या विमृत्युर्भवतीति वाक्यशेषः ॥ १८ ॥ | रहित ) होकर ब्रह्मप्राप्तिद्वारा मृत्युहीन हो जाता है— वह वाक्यशेष है ॥ १८ ॥ |
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| शिष्याचार्ययोः प्रमादकृतान्यायेन विद्याग्रहणप्रतिपादननिमित्तदोषप्रशमनार्थेयं शान्तिरुच्यते— | अब शिष्य और आचार्यके प्रमादकृत अन्यायसे विद्याके ग्रहण और प्रतिपादनमें होनेवाले दोषोंकी निवृत्तिके लिये यह शान्ति कही जाती है— |
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शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ १९ ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
परमात्मा हम [ आचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करे। हमारा साथ-साथ पालन करे। हम साथ-साथ विद्यासम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें। हमारा अध्ययन किया हुआ तेजस्वी हो। हम द्वेष न करें ॥१९॥
| सह नावावामवतु पालयतु विद्यास्वरूपप्रकाशनेन । कः ? स एव परमेश्वर उपनिषत्प्रकाशितः । किं च सह नौ भुनक्तु तत्फलप्रकाशनेन नौ पालयतु । सहैवावां विद्याकृतं वीर्यं सामर्थ्यं करवावहै निष्पादयावहै । किं | विद्याके स्वरूपका प्रकाश कर हम दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करे। कौन [ रक्षा करे ? इसपर कहते हैं—] वह उपनिषत्प्रकाशित परमेश्वर ही [ हमारी रक्षा करे ]। तथा उसके फलको प्रकाशित कर वह हम दोनोंका साथ-साथ पालन करे। हम अपने विद्याकृत वीर्य—सामर्थ्यको साथ-साथ ही सम्पादित करें—प्राप्त करें। और |
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१६४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| १६४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| च तेजस्विनौ तेजस्विनोरावयोर्यदधीतं तत्स्वधीतमस्तु। अथवा तेजस्वि नावावाभ्यां यदधीतं तदतीव तेजस्वि वीर्यवदस्तु इत्यर्थः। मा विद्विषावहै शिष्याचार्यावन्योन्यं प्रमादकृतान्यायाध्ययनाध्यापनदोषनिमित्तं द्वेषं मा करवावहै इत्यर्थः। शान्तिः शान्तिः शान्तिरिति त्रिवचनं सर्वदोषोपशमनार्थमित्योमिति॥१९॥ | हम तेजस्वियोंका जो अध्ययन किया हुआ है वह सुपठित हो। अथवा तेजस्वी हो अर्थात् हमलोगोंका जो अध्ययन किया हुआ है वह अत्यन्त तेजस्वी यानी वीर्यवान् हो। हम शिष्य और आचार्य परस्पर विद्वेष न करें अर्थात् हम प्रमादकृत अन्यायसे अध्ययन और अध्यापनमें हुए दोषोंके कारण परस्पर एक दूसरेसे द्वेष न करें। 'शान्तिः शान्तिः शान्तिः' इस प्रकार 'शान्तिः' शब्दका तीन बार उच्चारण [आध्यात्मिकादि] सम्पूर्ण दोषोंकी शान्तिके लिये किया गया है। इत्योम् ॥१९॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली समाप्ता ॥३॥ (६)
इति कठोपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥
समाप्त
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
श्रीहरिः
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| अग्निर्यथैको भुवनम् ... | २ | २ | ९ | १२५ |
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः ... | २ | १ | १२ | १०९ |
| ,, ,, ... | ,, | ,, | १३ | ११० |
| ,, ,, ... | ,, | ३ | १७ | १६० |
| अजीर्यताममृतानाम् ... | १ | १ | २८ | ३५ |
| अणोरणीयान्महतः ... | १ | २ | २० | ६३ |
| अनुपश्य यथा पूर्वे ... | १ | १ | ६ | ११ |
| अन्यच्छ्रेयोऽन्यत् ... | १ | २ | १ | ३९ |
| अन्यत्र धर्मादन्यत्र ... | १ | २ | १४ | ५७ |
| अरण्योर्निहितः ... | २ | १ | ८ | १०५ |
| अविद्यायामन्तरे ... | १ | २ | ५ | ४४ |
| अव्यक्तात्तु परः ... | २ | ३ | ८ | १४६ |
| अशब्दमस्पर्शम् ... | १ | ३ | १५ | ९० |
| अशरीरँ शरीरेषु ... | १ | २ | २२ | ६७ |
| अस्तीत्येवोपलब्धव्यः ... | २ | ३ | १३ | १५४ |
| अस्य विस्रंसमानस्य ... | २ | २ | ४ | १२० |
| आत्मानँ रथिनम् ... | १ | ३ | ३ | ७५ |
| आशाप्रतीक्षे संगतम् ... | १ | १ | ८ | १३ |
| आसीनो दूरं व्रजति ... | १ | २ | २१ | ६५ |
| इन्द्रियाणां पृथग्भावम् ... | २ | ३ | ६ | १४४ |
| इन्द्रियाणि हयानाहुः ... | १ | ३ | ४ | ७६ |
| इन्द्रियेभ्यः परं मनः ... | २ | ३ | ७ | १४६ |
| इन्द्रियेभ्यः पराः ... | १ | ३ | १० | ८१ |
| इह चेदशकद्बोद्धुम् ... | २ | ३ | ४ | १४२ |
| उत्तिष्ठत जाग्रत ... | १ | ३ | १४ | ८८ |
| ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः ... | १ | १ | १ | ६ |
| ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति ... | २ | २ | ३ | ११९ |
| ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः ... | २ | ३ | १ | १३६ |
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
( २ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य ... | १ | ३ | १ | ७२ |
| एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा ... | २ | २ | १२ | १२९ |
| एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य ... | १ | २ | १३ | ५६ |
| एतत्तुल्यं यदि मन्यसे ... | १ | १ | २४ | ३१ |
| एतदालम्बन ँश्रेष्ठम् ... | १ | २ | १७ | ५९ |
| एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म ... | १ | २ | १६ | ५९ |
| एष तेऽग्निर्नचिकेतः ... | १ | १ | १९ | २५ |
| एष सर्वेषु भूतेषु ... | १ | ३ | १२ | ८४ |
| कामस्याप्तिं जगतः ... | १ | २ | ११ | ५३ |
| जानाम्यहँ शेवधिः ... | १ | २ | १० | ५२ |
| तँह कुमारँसन्तम् ... | १ | १ | २ | ७ |
| तदेतदिति मन्यन्ते ... | २ | २ | १४ | १३२ |
| तमब्रवीत्प्रीयमाणः ... | १ | १ | १६ | २१ |
| तं दुर्दर्शं गूढम् ... | १ | २ | १२ | ५४ |
| तां योगमिति मन्यन्ते ... | २ | ३ | ११ | १४९ |
| तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीः ... | १ | १ | ९ | १४ |
| त्रिणाचिकेतस्त्रयम् ... | १ | १ | १८ | २४ |
| त्रिणाचिकेतस्त्रिभिः ... | १ | १ | १७ | २२ |
| दूरमेते विपरीते ... | १ | २ | ४ | ४३ |
| देवैरत्रापि विचिकित्सितम् ... | १ | १ | २१ | २८ |
| ,, ... | ,, | ,, | २२ | २९ |
| न जायते म्रियते वा ... | १ | २ | १८ | ६० |
| न तत्र सूर्यो भाति ... | २ | २ | १५ | १३३ |
| न नरेणावरेण ... | १ | २ | ८ | ४८ |
| न प्राणेन नापानेन ... | २ | २ | ५ | १२१ |
| न वित्तेन तर्पणीयः ... | १ | १ | २७ | ३४ |
| न संदृशे तिष्ठति ... | २ | ३ | ९ | १४७ |
| न सांपरायः प्रतिभाति ... | १ | २ | ६ | ४५ |
| नाचिकेतमुपाख्यानम् ... | १ | ३ | १६ | ९२ |
| नायमात्मा प्रवचनेन ... | १ | २ | २३ | ६८ |
| नाविरतो दुश्चरितात् ... | १ | २ | २४ | ६९ |
| नित्योऽनित्यानाम् ... | २ | २ | १३ | १३१ |
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
( ३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| नैव वाचा न मनसा | २ | ३ | १२ | १५२ |
| नैषा तर्केण मतिः | १ | २ | ९ | ५० |
| पराचः कामाननुयन्ति | २ | १ | २ | ९७ |
| पराञ्चि खानि व्यतृणत् | २ | १ | १ | ९४ |
| पीतोदका जग्धतृणा | १ | १ | ३ | ८ |
| पुरमेकादशद्वारम् | २ | २ | १ | ११४ |
| प्र ते ब्रवीमि तदु | १ | १ | १४ | १९ |
| बहूनामेमि प्रथमः | १ | १ | ५ | १० |
| भयादस्याग्निस्तपति | २ | ३ | ३ | १४१ |
| मनसैवेदमाप्तव्यम् | २ | १ | ११ | १०८ |
| महतः परमव्यक्तम् | १ | ३ | ११ | ८२ |
| मृत्युप्रोक्तां नाचकेतः | २ | ३ | १८ | १६१ |
| य इमं परमम् | १ | ३ | १७ | ९३ |
| य इमं मध्वदम् | २ | १ | ५ | १०२ |
| य एष सुप्तेषु जागर्ति | २ | २ | ८ | १२४ |
| यच्छेद्वाङ्मनसी | १ | ३ | १३ | ८६ |
| यतश्चोदेति सूर्यः | २ | १ | ९ | १०६ |
| यथादर्शे तथा | २ | ३ | ५ | १४३ |
| यथा पुरस्ताद्भविता | १ | १ | ११ | १६ |
| यथोदकं दुर्गे वृष्टम् | २ | १ | १४ | १११ |
| यथोदकं शुद्धे शुद्धम् | २ | १ | १५ | ११२ |
| यदा पञ्चावतिष्ठन्ते | २ | ३ | १० | १४९ |
| यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते | २ | ३ | १५ | १५७ |
| यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते | २ | ३ | १४ | १५५ |
| यदिदं किं च जगत्सर्वम् | २ | ३ | २ | १४० |
| यदेवेह तदमुत्र | २ | १ | १० | १०७ |
| यस्तु विज्ञानवान् | १ | ३ | ६ | ७८ |
| ” | १ | ३ | ८ | ७९ |
| यस्त्वविज्ञानवान् | १ | ३ | ५ | ७७ |
| ” | १ | ३ | ७ | ७९ |
| यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति | १ | १ | २९ | ३७ |
| यस्य ब्रह्म च क्षत्रम् | १ | २ | २५ | ७० |
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
( ४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| यः पूर्वं तपसः | २ | १ | ६ | १०३ |
| यः सेतुरीजानानाम् | १ | ३ | २ | ७४ |
| या प्राणेन संभवति | २ | १ | ७ | १०४ |
| येन रूपं रसम् | २ | १ | ३ | ९९ |
| येयं प्रेते विचिकित्सा | १ | १ | २० | २७ |
| ये ये कामा दुर्लभाः | १ | १ | २५ | ३१ |
| योनिमन्ये प्रपद्यन्ते | २ | २ | ७ | १२३ |
| लोकादिमग्निम् | १ | १ | १५ | २० |
| वायुर्यथैको भुवनम् | २ | २ | १० | १२७ |
| विज्ञानसारथिर्यस्तु | १ | ३ | ९ | ८० |
| वैश्वानरः प्रविशति | १ | १ | ७ | १२ |
| शतं चैका च हृदयस्य | २ | ३ | १६ | १५९ |
| शतायुषः पुत्रपौत्रान् | १ | १ | २३ | ३० |
| शान्तसंकल्पः सुमनाः | १ | १ | १० | १५ |
| श्रवणायापि बहुभिः | १ | २ | ७ | ४७ |
| श्रेयश्च प्रेयश्च | १ | २ | २ | ४१ |
| श्वोभावा मर्त्यस्य | १ | १ | २६ | ३३ |
| स त्वमग्निꣳस्वर्ग्यम् | १ | १ | १३ | १८ |
| स त्वं प्रियान्प्रियरूपाꣳश्च | १ | २ | ३ | ४२ |
| सर्वे वेदा यत्पदम् | १ | २ | १५ | ५८ |
| सह नाववतु | २ | ३ | १९ | १६३ |
| स होवाच पितरम् | १ | १ | ४ | ९ |
| सूर्यो यथा सर्वलोकस्य | २ | २ | ११ | १२७ |
| स्वप्नान्तं जागरितान्तम् | २ | १ | ४ | १०१ |
| स्वर्गे लोके न भयम् | १ | १ | १२ | १७ |
| हꣳसः शुचिषद्वसुः | २ | २ | २ | ११६ |
| हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि | २ | २ | ६ | १२२ |
| हन्ता चेन्मन्यते | १ | २ | १९ | ६२ |