कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
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( ४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| यः पूर्वं तपसः | २ | १ | ६ | १०३ |
| यः सेतुरीजानानाम् | १ | ३ | २ | ७४ |
| या प्राणेन संभवति | २ | १ | ७ | १०४ |
| येन रूपं रसम् | २ | १ | ३ | ९९ |
| येयं प्रेते विचिकित्सा | १ | १ | २० | २७ |
| ये ये कामा दुर्लभाः | १ | १ | २५ | ३१ |
| योनिमन्ये प्रपद्यन्ते | २ | २ | ७ | १२३ |
| लोकादिमग्निम् | १ | १ | १५ | २० |
| वायुर्यथैको भुवनम् | २ | २ | १० | १२७ |
| विज्ञानसारथिर्यस्तु | १ | ३ | ९ | ८० |
| वैश्वानरः प्रविशति | १ | १ | ७ | १२ |
| शतं चैका च हृदयस्य | २ | ३ | १६ | १५९ |
| शतायुषः पुत्रपौत्रान् | १ | १ | २३ | ३० |
| शान्तसंकल्पः सुमनाः | १ | १ | १० | १५ |
| श्रवणायापि बहुभिः | १ | २ | ७ | ४७ |
| श्रेयश्च प्रेयश्च | १ | २ | २ | ४१ |
| श्वोभावा मर्त्यस्य | १ | १ | २६ | ३३ |
| स त्वमग्निꣳस्वर्ग्यम् | १ | १ | १३ | १८ |
| स त्वं प्रियान्प्रियरूपाꣳश्च | १ | २ | ३ | ४२ |
| सर्वे वेदा यत्पदम् | १ | २ | १५ | ५८ |
| सह नाववतु | २ | ३ | १९ | १६३ |
| स होवाच पितरम् | १ | १ | ४ | ९ |
| सूर्यो यथा सर्वलोकस्य | २ | २ | ११ | १२७ |
| स्वप्नान्तं जागरितान्तम् | २ | १ | ४ | १०१ |
| स्वर्गे लोके न भयम् | १ | १ | १२ | १७ |
| हꣳसः शुचिषद्वसुः | २ | २ | २ | ११६ |
| हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि | २ | २ | ६ | १२२ |
| हन्ता चेन्मन्यते | १ | २ | १९ | ६२ |