भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 32
२०कठोपनिषद्[ अध्याय १

| इदं श्रुतेर्वचनम् । | यह श्रुतिका वचन है— |

लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै<br>या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।<br>स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त-<br>मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५ ॥

तब यमराजने लोकोंके आदिकारणभूत उस अग्निका तथा उसके चयन करनेमें जैसी और जितनी ईंटें होती हैं, एवं जिस प्रकार उसका चयन किया जाता है उन सबका नचिकेताके प्रति वर्णन कर दिया। और उस नचिकेताने भी जैसा उससे कहा गया था वह सब सुना दिया। इससे प्रसन्न होकर मृत्यु फिर बोला ॥ १५ ॥

| लोकादिं लोकानामादिं प्रथमशरीरित्वादग्निं तं प्रकृतं नचिकेतसा प्रार्थितमुवाचोक्तवान् मृत्युस्तस्मै नचिकेतसे । किं च या इष्टकाश्चेतव्याः स्वरूपेण, यावतीर्वा संख्यया, यथा वा चीयतेऽग्निर्येन प्रकारेण सर्वमेतद् उक्तवानित्यर्थः। स चापि नचिकेतास्तन्मृत्युनोक्तं यथावत्प्रत्ययेनावदत्प्रत्युच्चारितवान् । अथ तस्य प्रत्युच्चारणेन तुष्टः सन्मृत्युः पुनरेवाह वरत्रयव्यतिरेकेणान्यं वरं दित्सुः ॥ १५ ॥ | नचिकेताने जिसके लिये प्रार्थना की थी और जिसका प्रकरण चल रहा है प्रथम शरीरी होनेके कारण लोकोंके आदिभूत उस अग्निका यमने नचिकेताके प्रति वर्णन कर दिया। तथा स्वरूपतः जिस प्रकारकी और संख्यामें जितनी ईंटोंका चयन करना चाहिये एवं यथा यानी जिस तरह अग्निका चयन किया जाता है वह सब भी कह दिया। तथा उस नचिकेताने भी, जिस प्रकार उसे मृत्युने बताया था वह सब समझकर ज्यों-का-त्यों सुना दिया। तब उसके प्रत्युच्चारणसे प्रसन्न हो मृत्युने इन तीन वरके अतिरिक्त और भी वर देनेकी इच्छासे उससे फिर कहा ॥ १५ ॥ |