कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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इसी तरह कई बार पूछनेपर जब वाजश्रवाने खीझकर कहा कि मैं तुझे मृत्युको दूँगा, तो उन्होंने यह जानकर भी कि पिताजी क्रोधवश ऐसा कह गये हैं, उनके कथनकी उपेक्षा नहीं की। महाराज दशरथने वस्तुस्थितिको बिना समझे ही कैकेयीको वचन दिये थे; किन्तु भगवान् रामने उनकी गम्भीरताका निर्णय करनेकी कोई आवश्यकता नहीं समझी। जिस समय द्रौपदीके स्वयंवरमें अर्जुनने मत्स्यवेध किया और पाण्डवलोग द्रौपदीको लेकर अपने निवास-स्थानपर आये उस समय माता कुन्तीने बिना जाने-बूझे घरके भीतरसे ही कह दिया था कि 'सब भाई मिलकर भोगो'। माताकी यह उक्ति सर्वथा लोकविरुद्ध और भ्रान्तिजनित थी, परन्तु मातृभक्त पाण्डवोंको उसका अक्षरशः पालन ही अभीष्ट हुआ। ऐसा ही प्रसंग नचिकेताके सामने उपस्थित हुआ और उन्होंने भी अपने पिताके वचनकी रक्षाके लिये उनके मोहजनित वात्सल्य और अपने ऐहिक जीवनको सत्यकी वेदीपर निछावर कर दिया।
हमारे बहुत-से भाइयोंको इस प्रकारके अनभिप्रेत और अनर्गल कथनकी मर्यादा रखनेके लिये इतना सरदर्द मोल लेना कोरी भूल और भोलापन ही जान पड़ेगा। किन्तु उन्हें इसका रहस्य समझनेके लिये कुछ गम्भीर विचारकी आवश्यकता है। योगदर्शनके साधन-पादमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पाँच यमोंका नाम-निर्देश करनेके अनन्तर ही कहा है—'जातिदेशकाल-समयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्' (यो० सू० २।३१) अर्थात् जाति, देश, काल और कर्त्तव्यानुरोधकी अपेक्षा न करते हुए इनका सर्वथा पालन करना महाव्रत है तथा जाति, देश और कालादिकी अपेक्षासे पालन करना अल्पव्रत कहलाता है। इनमें अल्पव्रतमें ही लोकाचार, सुविधा और हानि-लाभ आदिके विचारकी गुञ्जाइश है। उसे हम व्यावहारिक धर्म कह सकते हैं। वह किसी विशेष सिद्धिका कारण नहीं हो सकता; सिद्धियोंकी प्राप्ति तो महाव्रतसे ही होती है। योगदर्शनमें इससे आगे जो भिन्न-भिन्न यम-नियमादिकी प्रतिष्ठासे भिन्न-भिन्न सिद्धियोंकी प्राप्ति बतलायी है वह महाव्रतीको ही हो सकती है। इस प्रकारका महाव्रत, व्यवहारी लोगोंकी दृष्टिमें