कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 61, कुल 182 में से
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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अथवा स्वात्मभूतेऽनन्यस्मिन् आत्मनि प्रोक्तेऽनन्यप्रोक्ते गतिः अत्रान्यावगतिर्नास्ति ज्ञेयस्यान्यस्य अभावात् । ज्ञानस्य ह्येषा परा निष्ठा यदात्मैकत्वविज्ञानम् । अतोऽवगन्तव्याभावान्न गतिः अत्रावशिष्यते । संसारगतिर्वात्र नास्त्यनन्य आत्मनि प्रोक्ते नान्तरीयकत्वात्तद्विज्ञानफलस्य मोक्षस्य । | अथवा अनन्यप्रोक्त—अपने स्वरूपभूत अनन्य आत्माका गुरुद्वारा उपदेश किये जानेपर अन्य ज्ञेय वस्तुका अभाव हो जानेके कारण उसमें कोई गति यानी अन्य अवगति (ज्ञान) नहीं रहती; क्योंकि आत्माके एकत्वका जो विज्ञान है यही ज्ञानकी परा निष्ठा है। अतः ज्ञेय वस्तुका अभाव हो जानेके कारण फिर यहाँ कोई और गति नहीं रहती। अथवा उस अनन्य अर्थात् स्वात्मभूत आत्मतत्त्वके उपदेश कर दिये जानेपर संसारकी गति नहीं रहती, क्योंकि उसके अनन्तर तुरन्त ही आत्मविज्ञानका फलरूप मोक्ष प्राप्त हो जाता है। |
| अथवा प्रोच्यमानब्रह्मात्मभूतेनाचार्येण प्रोक्त आत्मनि अगतिरनवबोधोऽपरिज्ञानम् अत्र नास्ति। भवत्येवावगतिस्तद्विषया श्रोतुस्तदस्म्यहमित्याचार्यस्येवेत्यर्थः। | अथवा जिसका आगे वर्णन किया जायगा उस ब्रह्मात्मभूत आचार्यद्वारा उपदेश किये हुए इस आत्मतत्त्वमें फिर अगति—अनवबोध अर्थात् अपरिज्ञान नहीं रहता। अर्थात् आचार्यके समान उस श्रोताको भी यह आत्मविषयक ज्ञान हो ही जाता है कि 'वह (ब्रह्म) मैं हूँ'। |
| एवं सुविज्ञेय आत्मा आगमवता आचार्येणानन्यतया प्रोक्तः। इतरथा ह्यणीयानणुप्रमाणादपि | इस प्रकार शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा अभिन्नरूपसे कहा हुआ आत्मा सुविज्ञेय होता है। नहीं तो, यह अणुप्रमाण वस्तुओंसे भी अणु हो |