भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 60
४८कठोपनिषद्[ अध्याय १
कस्मात्—क्योंकि—

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न नरेणावरेण प्रोक्त एष
सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति
अणीयान्ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥

कई प्रकारसे कल्पना किया हुआ यह आत्मा नीच पुरुषद्वारा कहे जानेपर अच्छी तरह नहीं जाना जा सकता । अभेददर्शी आचार्यद्वारा उपदेश किये गये इस आत्मामें [ अस्ति-नास्तिरूप ] कोई गति नहीं है, क्योंकि यह सूक्ष्म परिमाणवालोंसे भी सूक्ष्म और दुर्विज्ञेय है ॥ ८ ॥

[संस्कृत-भाष्यम्][हिन्दी-अनुवाद]
न हि नरेण मनुष्येणावरेण प्रोक्तोऽवरेण हीनेन प्राकृतबुद्धिना इत्येतदुक्त एष आत्मा यं त्वं मां पृच्छसि । न हि सुष्ठु सम्यग्विज्ञेयो विज्ञातुं शक्यो यस्माद् बहुधास्ति नास्ति कर्ताकर्ता शुद्धोऽशुद्ध इत्याद्यनेकधा चिन्त्यमानो वादिभिः ।यह आत्मा, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, किसी अवर—हीन यानी साधारण बुद्धि-वाले मनुष्यसे कहा जानेपर अच्छी तरह नहीं जाना जा सकता; क्योंकि यह वादियोंद्वारा अस्ति-नास्ति, कर्ता-अकर्ता एवं शुद्ध-अशुद्ध—इस प्रकार अनेक तरहसे चिन्तन किया जाता है ।
कथं पुनः सुविज्ञेय इत्युच्यते—<br>(विद्योपलब्धौ दैशिकादेशस्य प्राधान्यम्)<br>अनन्यप्रोक्तेऽनन्येन अपृथग्दर्शिना आचार्येण प्रतिपाद्य-ब्रह्मात्मभूतेन प्रोक्त उक्त आत्मनि गतिरनेकधास्ति नास्तीत्यादि-लक्षणा चिन्ता गतिरत्रास्मिन् आत्मनि नास्ति न विद्यते सर्ववि-कल्पगतिप्रत्यस्तमितत्वादात्मनः।तो फिर यह किस प्रकार अच्छी तरह जाना जाता है? इसपर कहते हैं—अनन्यप्रोक्त— अनन्य अर्थात् अपने प्रतिपाद्य ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हुए अपृथग्दर्शी आचार्यद्वारा कहे हुए इस आत्मामें अस्ति-नास्ति-रूप गति यानी चिन्ता नहीं है, क्योंकि आत्मा सम्पूर्ण विकल्पोंकी गतिसे रहित है ।