कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 59, कुल 182 में से
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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
आत्मज्ञानकी दुर्लभता
| यस्तु श्रेयोऽर्थी सहस्रेषु कश्चिदेवात्मविद्भवति त्वद्विधो यस्मात्— | किन्तु जो तेरे समान श्रेयकी इच्छावाला है ऐसा तो हजारोंमें कोई ही आत्मवेत्ता होता है; क्योंकि— |
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श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः
शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा-
श्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥
जो बहुतोंको तो सुननेके लिये भी प्राप्त होनेयोग्य नहीं है, जिसे बहुत-से सुनकर भी नहीं समझते उस आत्मतत्त्वका निरूपण करनेवाला भी आश्चर्य्यरूप है, उसको प्राप्त करनेवाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल आचार्यद्वारा उपदेश किया हुआ ज्ञाता भी आश्चर्य्यरूप है ॥ ७ ॥
| श्रवणायापि श्रवणार्थं श्रोतुम् अपि यो न लभ्य आत्मा बहुभिरनेकैः शृण्वन्तोऽपि बहवोऽनेकेऽन्ये यमात्मानं न विद्युर्न विदन्त्यभागिनोऽसंस्कृतात्मानो न विजानीयुः । किं चास्य वक्तापि आश्चर्योऽद्भुतवदेवानेकेषु कश्चिद् एव भवति । तथा श्रुत्वाप्यस्य आत्मनः कुशलो निपुण एवानेकेषु लब्धा कश्चिदेव भवति । यस्माद् आश्चर्यो ज्ञाता कश्चिदेव कुशलानुशिष्टः कुशलेन निपुणेन आचार्येणानुशिष्टः सन् ॥७॥ | जो आत्मा बहुतोंको तो सुननेके लिये भी नहीं मिलता तथा दूसरे बहुत-से अभागी अशुद्धचित्त पुरुष जिस आत्मतत्त्वको सुनकर भी नहीं जान पाते । यही नहीं, इसका वक्ता भी आश्चर्य अर्थात् अद्भुत-सा ही है—वह भी अनेकोंमें कोई ही होता है । तथा सुनकर भी इस आत्माका लब्धा (ग्रहण करनेवाला) तो अनेकोंमें कोई निपुण पुरुष ही होता है, क्योंकि जिसे [आत्मदर्शनमें] कुशल आचार्यने उपदेश किया हो ऐसा इसका ज्ञाता भी आश्चर्य्यरूप ही है ॥७॥ |
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