कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
| तार्किको ह्यनागमज्ञः स्वबुद्धिपरिकल्पितं यत्किञ्चिदेव कथयति । अत एव च येयमागमप्रसूता मतिरन्येनैवागमाभिज्ञेन आचार्येणैव तार्किकात्प्रोक्ता सती सुज्ञानाय भवति हे प्रेष्ठ प्रियतम ।<br><br>का पुनः सा तर्कागम्या मतिरित्युच्यते—<br><br>यां त्वं मतिं मद्वरप्रदानेन आपः प्राप्तवानसि । सत्या अवितथविषया धृतिर्यस्य तव स त्वं सत्यधृतिर्बतासीत्यनुकम्पयन्नाह मृत्युर्नचिकेतसं वक्ष्यमाणविज्ञानस्तुतये । त्वादृक्त्वत्तुल्यो नः अस्मभ्यं भूयाद्भवताद्भवत्वन्यः पुत्रः शिष्यो वा प्रष्टा; कीदृग्त्वादृक्त्वं हे नचिकेताः प्रष्टा ॥९॥ | जाने योग्य नहीं है, क्योंकि तार्किक तो अध्यात्मशास्त्रसे अनभिज्ञ होता है, वह अपनी बुद्धिसे कल्पना किया हुआ चाहे जो कहता रहता है। अतः हे प्रेष्ठ—प्रियतम ! यह जो शास्त्रजनित आत्मबुद्धि है वह तो तार्किकसे भिन्न किसी शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा उपदेश की जानेपर ही सम्यक् ज्ञानकी कारण होती है।<br><br>अच्छा तो, तर्कसे प्राप्त न होने योग्य वह मति कौन-सी है ? इसपर कहते हैं—<br><br>जिस मतिको तूने मेरे वर-प्रदानसे प्राप्त किया है। जिस तेरी धृति सत्य अर्थात् यथार्थ पदार्थको विषय करनेवाली है वह तू सत्य-धृति है। 'बत' इस अव्ययसे अनुकम्पा करते हुए यमराज आगे कहे जानेवाले विज्ञानकी स्तुतिके लिये नचिकेतासे कहते हैं—'हे नचिकेताः ! हमें तेरे समान प्रश्न करनेवाला और भी पुत्र अथवा शिष्य मिले। परन्तु वह हो कैसा ? जैसा कि तू प्रश्न करनेवाला है' ॥९॥ | | पुनरपि तुष्ट आह— | नचिकेतासे प्रसन्न हुए मृत्युने फिर भी कहा— |