कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
| इत्यर्थः । तेनाहमधिकारापन्नो नित्यं याम्यं स्थानं स्वर्गाख्यं नित्यमापेक्षिकं प्राप्तवानस्मि ॥१०॥ | सम्पादन किया था ! उसीसे मैं अधिकार सम्पन्न होकर आपेक्षिक नित्य स्वर्ग नामक याम्यस्थानको प्राप्त हुआ हूँ ॥ १० ॥ |
नचिकेताके त्यागकी प्रशंसा
कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां
क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् ।
स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा
धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥
हे नचिकेतः ! तूने बुद्धिमान् होकर भोगोंकी समाप्ति (अवधि), जगत्की प्रतिष्ठा, यज्ञफलके अनन्तत्व, अभयकी मर्यादा, स्तुत्य और महती (अणिमादि ऐश्वर्ययुक्त) विस्तीर्ण गति तथा प्रतिष्ठाको देखकर भी उसे धैर्यपूर्वक त्याग दिया है ॥ ११ ॥
| त्वं तु कामस्याप्तिं समाप्तिम्,<br><br>अत्रैवैहैव सर्वे कामाः परिसमाप्ताः,<br><br>जगतः साध्यात्माधिभूताधिदैवादेः प्रतिष्ठामाश्रयं सर्वात्मकत्वात्, क्रतोः फलं हैरण्यगर्भं पदमनन्त्यमानन्त्यम्, अभयस्य च पारं परां निष्ठाम्, स्तोमं | किन्तु हे नचिकेतः ! तुमने तो धीर—धृतिमान् होकर कामनाओंकी प्राप्ति—समाप्तिको, क्योंकि इस [हिरण्यगर्भ पद] में ही सम्पूर्ण कामनाएँ समाप्त होती हैं, तथा सर्वात्मक होनेके कारण अध्यात्म, अधिभूत एवं अधिदैवरूप जगत्की प्रतिष्ठा यानी आश्रयको, यज्ञके अनन्त्य—आनन्त्य अर्थात् अनन्त फल हिरण्यगर्भ पदको, अभयके पार अर्थात् परा निष्ठाको और स्तोम— |