भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 182 में से

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पृष्ठ 67
वल्ली २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५५

| तं दुर्दर्शं दुःखेन दर्शनम् अस्येति दुर्दर्शोऽतिसूक्ष्मत्वात् , गूढं गहनमनुप्रविष्टं प्राकृतविषय-विकारविज्ञानैः प्रच्छन्नमित्येतत् , गुहाहितं गुहायां बुद्धौ स्थितं तत्रोपलभ्यमानत्वात् , गह्वरेष्ठं गह्वरे विषमेऽनेकानर्थसंकटं तिष्ठतीति गह्वरेष्ठम् । यत एवं गूढमनुप्रविष्टो गुहाहितश्चातो गह्वरेष्ठः; अतो दुर्दर्शः । | अति सूक्ष्म होनेके कारण दुर्दर्श—जिसका कठिनतासे दर्शन हो सके उसे दुर्दर्श कहते हैं, गूढ अर्थात् गहन स्थानमें अनुप्रविष्ट यानी शब्दादि प्राकृत विषयविकाररूप विज्ञानसे छिपे हुए, गुहा—बुद्धिमें उपलब्ध होनेके कारण उसीमें स्थित तथा गह्वरेष्ठ—गह्वर—विषम यानी अनेक अनर्थोंसे सङ्कुलित स्थानमें रहनेवाले [देवको जानकर धीर पुरुष हर्ष-शोकको त्याग देता है] । क्योंकि आत्मा इस प्रकार गूढ स्थानमें अनुप्रविष्ट और बुद्धिमें स्थित है इसलिये वह गह्वरेष्ठ है तथा गह्वरेष्ठ होनेके कारण ही दुर्दर्श है । | | तं पुराणं पुरातनमध्यात्म-योगाधिगमेन विषयेभ्यः प्रति-संहृत्य चेतस आत्मनि समाधानम् अध्यात्मयोगस्तस्याधिगमस्तेन मत्वा देवमात्मानं धीरो हर्ष-शोकावात्मन उत्कर्षापकर्षयोः अभावाज्हाति ॥ १२ ॥ | उस पुराण यानी पुरातन देवको अध्यात्मयोगकी—चित्तको विषयोंसे हटाकर आत्मामें लगा देना अध्यात्मयोग है, उसकी प्राप्तिद्वारा जानकर धीर पुरुष अपने उत्कर्ष-अपकर्षका अभाव हो जानेके कारण हर्ष-शोकका परित्याग कर देता है ॥ १२ ॥ |


कठो० ३—इसके सिवा—
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