कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ें| वल्ली २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५९ |
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| ओमित्येतत् । तदेतत्पदं यद्बुभुत्सितं त्वया । यदेतद् ओमित्योंशब्दवाच्योंशब्दप्रतीकं च ॥ १५ ॥ | 'ॐ' यही वह पद है । यह जो 'ॐ' है यानी जो ॐ शब्दका वाच्य और ॐ ही जिसका प्रतीक है वही वह पद है जिसे तू जानना चाहता है ॥ १५ ॥ | | अतः— | इसलिये— |
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥
यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह० अक्षर ही पर है; इस अक्षरको ही जानकर जो जिसकी इच्छा करता है, वही उसका हो जाता है ॥ १६ ॥
| एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्मापरमेतद्ध्येवाक्षरं परं च । तयोर्हि प्रतीकमेतदक्षरम्, एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वोपास्य ब्रह्मेति यो यदिच्छति परमपरं वा तस्य तद्भवति । परं चेज्ज्ञातव्यमपरं चेत्प्राप्तव्यम् ॥ १६ ॥ | यह अक्षर ही अपर ब्रह्म है और यह अक्षर ही पर ब्रह्म है । यह अक्षर उन दोनोंहीका प्रतीक है । इस अक्षरको ही 'यही उपास्य ब्रह्म है' ऐसा जानकर जो पर अथवा अपर जिस ब्रह्मकी इच्छा करता है उसे वही प्राप्त हो जाता है । यदि उसका उपास्य पर ब्रह्म हो तो वह केवल जाना जा सकता है और यदि अपर ब्रह्म हो तो प्राप्त किया जा सकता है ॥ १६ ॥ | | यत एवमतः— | क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये— |
एतदालम्बनँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥