कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बक १९५ रानी ने भी कहा कि 'राजन् ! मृगावती को सहस्रानीक के लिए अवश्य देना चाहिए। यह बात स्वप्न में मुझे किसी ब्राह्मण ने कही है ऐसा मालूम होता है' ॥३९॥ रानी की सम्मति प्राप्त कर प्रसन्नचित्त राजा ने दूत को मृगावती का याचना माना तथा उसका अप्रतिम रूप दिखाया ॥४०॥ अनुकूल समय में राजा कृतवर्मा ने कमनीय ललित कलाओं की एकमात्र आधार चन्द्रमा की मूर्तिमयी प्रतिमा के समान सुन्दरी उस कन्या मृगावती को विधिपूर्वक राजा शतानीक के लिए दे दिया ॥४१॥ जिस प्रकार शास्त्र और बुद्धि का संगम परस्पर आदान-प्रदान के लिए होता है उसी प्रकार सहस्रानीक और मृगावती का समागम भी परस्पर गुणों के आदान-प्रदान के लिए हुआ ॥४२॥ कुछ समय के अनन्तर राजा के मन्त्रियों के पुत्र उत्पन्न हुए। प्रधान मन्त्री युगन्धर का पुत्र यौगन्धरायण सेनापति सुप्रतीक का पुत्र रुमण्वान् और राजा के नर्म सचिव (विदूषक) का पुत्र वसन्तक नामक हुआ ॥४३-४४॥ कुछ दिनों के अनन्तर राजा सहस्रानीक की पीत मुखवाली पत्नी मृगावती ने भी गर्भ धारण किया ॥४५॥ गर्भ-धारण के अनन्तर रानी ने रुधिर से भरी हुई तड़ाग-वापी में गोता लगाने की इच्छा उस राजा से प्रकट की जिस (राजा को) देखते-देखते उसकी आँखें तृप्त नहीं होती थीं ॥४६॥ धार्मिक राजा सहस्रानीक ने रानी की इच्छा-पूर्ति के लिए लाख आदि लाल वस्तुओं के लाल रस से भरी बावली बनवाई जो रक्त से भरी मालूम होती थी ॥४७॥ उस लाल वापी में स्नान करती हुई लाल लाख के रस से लिपटी हुई रानी को देखकर गरुड़-वंश के किसी पक्षी १ ने मांसपिंड समझकर उठा लिया ॥४८॥ महावीर्यवान पक्षी द्वारा उड़ाकर ले जाई गई रानी को ढूंढ़ने के लिए व्याकुलचित्त राजा सहस्रानीक का धैर्य नष्ट हो गया ॥४९॥ उस पक्षी ने केवल रानी को ही नहीं रानी के प्रति अनुरक्त राजा के चित्त का भी हरण कर लिया। इसी कारण राजा मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर गया ॥५०॥ कुछ समय के अनन्तर राजा के सचेत होने पर अपने प्रभाव से स्थिति को समझकर मातलि आकाश-मार्ग से उतरकर राजा के पास आया ॥५१॥ मातलि ने राजा को आश्वासन देते हुए पूर्व समय में तिलोत्तमा द्वारा दिये गये शाप का वृत्तान्त और चौदह वर्ष की अवधि का समाचार सुनाया। राजा के कुछ स्वस्थ होने पर मातलि पुनः स्वर्ग को चला गया ॥५२॥ 'हा प्रिये अब उस पापिन तिलोत्तमा का मनोरथ पूर्ण हो गया'—इस प्रकार शोक-विह्वल राजा विलाप करता रहा ॥५३॥ १ अरेबियन नाइट्स में सिंदबाद जहाजी की कहानी में ऐसे पक्षी का वर्णन आता है। कुछ लोग इसे कल्पित पक्षी मानते हैं। पर्वतों में ऐसे पक्षी दीखते हैं; जो बड़े-बड़े साँपों और पशुओं के बच्चों को उठा ले जाते हैं। —अनु.