कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बक १५९ कुछ दिनों बाद वह शान्त मृगोंवाले प्रशान्त पावन जमदग्नि ऋषि के आश्रम में पहुँचा ॥२३॥ वहाँ उसने सस्नेह अतिथि-सत्कार करते हुए, तपस्या के मूर्तिमान् आकार, एवं पवित्र दर्शन जमदग्नि ऋषि के प्रणामपूर्वक दर्शन किये ॥२४॥ आश्रम में मुनि जमदग्नि ने पुत्री-सहित आनन्दित एवं सुख की मूर्ति रानी मृगावती को राजा के लिए अर्पण कर दिया ॥२५॥ शाप का अन्त होने पर (चौदह वर्षों के पश्चात्) उन दोनों राजा और रानी का परस्पर दर्शन आनन्द के आँसुओं से छलछलाती आँखों में मानों अमृत-वर्षा कर रहा था ॥२६॥ प्रथम दर्शन के कारण उदयन को हृदय से लगाये हुए राजा रोमांच के कारण शरीर से बड़े हुए के समान उसे कठिनता से दूर कर सका ॥२७॥ तपोवन के अन्त तक आँसू बहाते हुए मृगों से अनुसरण किया गया राजा उदयन और मृगावती को साथ लेकर जमदग्नि ऋषि से आज्ञा प्राप्त कर अपनी नगरी की ओर चला। आश्रम से चलकर प्रिया को अपनी विरह-व्यथा सुनाता हुआ राजा मानों नागरिक लोगों के विकसित नेत्रों से पान किया जाता हुआ क्रमशः कौशाम्बी नगरी में पहुँचा ॥२८-२९॥ राजधानी में पहुँचते ही सर्वप्रथम उसने उदयन को युवराज-पद पर अभिषिक्त किया। अपने मन्त्रियों के पुत्रों को उसने सम्मतिकार के रूप में नियुक्त कर दिया। उस समय उदयन के अभिषेक के समय आकाश से पुष्पवृष्टि के साथ यह वाणी हुई कि 'वसन्तक, रुरुम्मान् और यौगन्धरायण—इन मुख्य मंत्रियों की सहायता से सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य करेंगे' ॥२११-२१४॥ तदनन्तर युवराज उदयन पर राज्य का भार देकर राजा चिरकाल से अभिलषित सांसारिक सुखों का मृगावती के साथ उपभोग करने लगा ॥२१५॥ कुछ समय आनन्द का उपभोग कर लेने पर शान्ति की दूती वृद्धावस्था के कान के समीप आ जाने पर, उसे देखकर राजा की विषय-वासना मानों शोषित¹ होकर उससे दूर हो गई ॥२१६॥ १. पत्नी स्त्री अपने पति को अन्य स्त्री में अनुरक्त देखकर जो ईर्ष्या करती है, उसे मान, प्रणयरुष या सौतियाडाह कहते हैं।—अनु.