कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय लम्बक १९५ तब वह नकली देवता लोहजंघ रूपणिका से बोला—'तुम्हारी माता पापिनी है, उसे स्पष्ट रूप से स्वर्ग नहीं ले जाया जा सकता। हाँ एकादशी के दिन स्वर्ग का द्वार खुलता है। उस द्वार से सबसे पहले शिवजी के भक्तगण उसमें प्रवेश करते हैं। यदि इन शिवगणों में उनका-सा वेष बनाकर तुम्हारी माता की भरती करा दी जाय तो वह स्वर्ग में जा सकती है। इसलिए इसके सिर को छुरे से मुँड़ाकर सिर पर पाँच शिखाएँ या चोटियाँ रखवाओ। और गल में हड्डियों की माला और शरीर का एक भाग काजल से काला तथा दूसरा सिन्दूर से लाल करके और नंगी करके उसे शिवगणों में भरती किया जा सकेगा। यदि वह इस प्रकार शिवगण के रूप में मेरे साथ जावे तो मैं उसे स्वर्ग ले जा सकता हूँ॥१६६—१६९॥ ऐसा कहकर और कुछ ठहरकर लोहजंघ चला गया। पूर्वनिर्णयानुसार एकादशी को प्रातःकाल रूपणिका ने स्वर्ग जाने के लिए उत्सुक माता को गणों का वेश बनाकर तैयार कर दिया। सायंकाल लोहजंघ उसी प्रकार वेश्या के घर आया और रूपणिका ने माता को उसे सौंप दिया॥१७०—१७२॥ लोहजंघ भी अपने नित्यकृत्य से निवृत्त होकर उस विद्रूपवेशा कुट्टनी को अपने साथ गरुड़ पर बैठाकर आकाश में उड़ गया। आकाश में उड़ते हुए उसने एक देव-मन्दिर के सामने गड़े हुए चक्र-चिह्नित पत्थर के स्तम्भ को देखा। उसी स्तम्भ में लगे हुए चक्र के सहारे अपना अपमान करनेवाली ध्वजा के समान उस कुट्टनी को उसने खड़ा कर दिया॥१७३—१७५॥ तब कुट्टनी से उसने कहा कि 'तुम कुछ देर के लिए यहाँ ठहरो। मैं तुम्हें गणों में भरती कराने का प्रबन्ध करता हूँ। ऐसा कहकर लोहजंघ उसकी आँखों से ओझल हो गया॥१७६॥ कुछ आगे जाकर उसने एक मन्दिर के समीप रात्रि-जागरण के लिए एकत्र हुए नागरिकों का मेला देखा। उसे देखकर वह आकाश से ही चिल्लाकर बोला—'हे नागरिक लोगो आज तुम्हारे ऊपर सर्वसंहारकारिणी महामारी गिरेगी। इसलिए भगवान् का भजन करो उन्ही की शरण में जाओ'॥१७७-१७८॥ इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर डरे हुए सभी मथुरावासी स्वस्ति पाठ करते हुए भगवान् के समीप जा बैठे॥१७९॥ वह लोहजंघ भी विहार से उतरकर पक्षी को बाँधकर और देवता का नकली वेश उतारकर साधारण नागरिक के वेश में उसी जन-समाज में चुपचाप आकर मिल गया॥१८०॥