भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक १९७ उधर चक्र के सहारे खम्भे पर चढ़ी कुट्टनी खड़े-खड़े थककर सोचने लगी कि अभी तक न तो भगवान् ही आये और न मैं ही स्वर्ग गई। ऐसा सोचकर त्रस्त कुट्टनी चिल्लाने लगी और गिरने के भय से कहने लगी—'मैं गिरती हूँ। उसका रोना-पीटना सुनकर देव-मन्दिर में एकत्र मथुरा के निवासी उस ही साक्षात् महामारी समझकर व्याकुल हो गये और कहने लगे कि 'मत गिरो मत गिरो। ॥१८६१—१८६४॥ इस प्रकार महामारी के पतन से घबराये हुए मथुरावासियों ने बाल-बच्चों के साथ वह रात किसी प्रकार व्यतीत की ॥१८६५॥ प्रातः काल के प्रकाश में सभी मथुरावासी प्रजा और राजा ने भी उस रूप में खम्भे पर खड़ी कुट्टनी को देखा और पहचाना ॥१८६५॥ महामारी का भय दूर होने पर तथा एक बार खूब हँसी हो जाने पर रूपणिका वेश्या माता का समाचार सुनकर वहाँ आई ॥१८६६॥ माता को इस प्रकार खम्भे पर खड़ी देखकर उसे अत्यन्त आश्चर्य हुआ और किसी प्रकार उसने उसे ऊपर से उतरवाया ॥१८६७॥ वहाँ एकत्र जनसमूह के पूछने पर उस कुट्टनी ने अपनी दुर्दशा का सारा वृत्तान्त लोगों से कह सुनाया ॥१८६८॥ इस विस्मयकारी घटना को किसी सिद्ध आदि का विनोद समझकर ब्राह्मण वैश्य और राजा आदि एकत्र लोगों ने कहा—'अनेक कामियों को ठगनेवाली इस कुट्टनी को भी जिसने इस प्रकार ठग लिया वह धन्य है। यदि वह इस जनसमाज में है, तो प्रकट हो जाय उसे पुरस्कार-स्वरूप पट्ट-बन्ध¹ किया जायगा' ॥१८६९-९०॥ इस घोषणा को सुनकर जनसमाज में छिपा हुआ लोहजंघ प्रकट हो गया और उसने जनता के पूछने पर समस्त वृत्तान्त सुना दिया ॥१९१॥ साथ ही उसने वहीं उपस्थित मथुरा-नरेश को शंख चक्र आदि उपहार भेंट कर दिये जिसे देखकर जनता ने अत्यन्त आश्चर्य प्रकट किया ॥१९२॥ तदनन्तर मथुरा के नागरिकों ने लोहजंघ के इस साहसिक कार्य पर सन्तोष प्रकट करते हुए उसे पट्ट बाँधकर पुरस्कृत किया और राजा की आज्ञा से वेश्या रूपणिका को स्वाधीन करा दिया अर्थात् उसे वेश्यावृत्ति से मुक्त कर दिया ॥१९३॥ इस प्रकार राजा तथा प्रजा से सम्मानित लोहजंघ लंका से प्राप्त धनराशि द्वारा अत्यन्त समृद्ध बनकर और कुट्टनी मकरदंष्ट्रा से बदला चुकाकर सुखपूर्वक मथुरा में निवास करने लगा ॥१९४॥

१ प्राचीन समय में जिस व्यक्ति का राजा या जनता से नागरिक सम्मान किया जाता था उसे विशेष प्रकार के मुकुट आदि पहनाकर और रथ में बैठाकर शोभायात्रा (जुलूस) के साथ नगर में घुमाकर सम्मानित किया जाता था।—अनु