भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक २१५ सिद्धिकरी भी उसे देखकर वृक्ष पर चढ़ गई और घने पत्तों में अपने को छिपाकर बैठ गई॥१४॥ नौकर के साथ उस बनिये ने आकर देखा तो केवल डोम फाँसी के फन्दे में झूल रहा है। उसने सिद्धिकरी को कहीं नहीं देखा। 'वह कहीं वृक्ष पर न चढ़ी हो' ऐसा सोचकर बनिये का नौकर वृक्ष पर चढ़ गया। उसे पेड़ पर चढ़कर समीप आया हुआ देखकर सिद्धिकरी बोली—'हे सुन्दर, मैं सचमुच तुम पर आसक्त हूँ। आओ यह धन भी लो और मेरे शरीर का भोग भी करो। ऐसा कहकर उसने उस भृत्य का आलिंगन करके चुम्बन लेते हुए उसकी जीभ को दाँतों से काट दिया ॥१५-१८॥ वेदना से पीड़ित और मुँह से रक्त बहाता हुआ बनिये का वह नौकर उस वृक्ष से नीचे गिरा और ल ल ल करता हुआ अस्पष्ट भाषण करने लगा ॥१९॥ उसे देखकर बनिया डरा कि इसपर भूत सवार हो गया है और बचे हुए नौकरों को लेकर शीघ्रता से घर की ओर भागा ॥११ ॥ उसके भागते ही वह तपस्विनी सिद्धिकरी वृक्ष से नीचे उतरी और धन की गठरी लेकर अपने घर पहुँची ॥१११॥ हे बेटे ! इस प्रकार मेरी शिष्या अति प्रतिभाशालिनी है और उसी की कृपा से मैंने बहुत-सा धन प्राप्त किया है॥११२॥ ऐसा कहकर उस परिव्राजिका ने उसी समय आई हुई अपनी शिष्या को उन्हें दिखाया और उसका परिचय उनसे कराया ॥११३॥ इसके पश्चात् उनसे बोली—'बेटे ! अब तुम अपना कार्य बताओ। किस स्त्री को तुमलोग चाहते हो। मैं उसे अभी सिद्ध करती हूँ' ॥११४॥ उसकी बाते सुनकर वैश्यपुत्र बोले—'गुहसेन व्यापारी की देवस्मिता नाम की जो स्त्री है, उससे हम लोगो का संगम कराओ' ॥११५॥ उनकी बात सुनकर परिव्राजिका ने कार्य साधने की प्रतिज्ञा की और उन वैश्यपुत्रों के ठहरने का प्रबन्ध अपने ही घर में कर दिया ॥११६॥ उनके वहाँ ठहरने पर उन्हें भोजन आदि सत्कार से प्रसन्न करके वह दुष्टत्री अपनी तपस्विनी शिष्या के साथ गुहसेन के घर गई ॥११७॥ जब वह देवस्मिता के द्वार पर पहुँची तब जंजीर में बँधी हुई कुतिया ने भूँकते हुए अन्दर जाने से रोका ॥११८॥