BharatKosha
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 266 of 876

Read in context
Page 266

द्वितीय लम्बक २२५ इस प्रकार समस्त जनता से प्रशंसित वह पतिव्रता देवस्मिता धन और पति को साथ लेकर अपनी नगरी ताम्रलिप्ति को लौट आई और फिर कभी उसे पति-वियोग नहीं हुआ ॥१९४॥ हे देवि ! इस प्रकार अच्छे कुल में उत्पन्न एवं धीर और उदार चरित्रवाली होती हैं जो अनन्य मन से पतिपरायण होती हैं क्योंकि पति ही सती स्त्रियों का परम देवता है ॥१९५॥ वसन्तक के मुख से इस प्रकार की कथा को सुनकर वासवदत्ता ने तुरन्त छोड़े हुए पिता के घर को लज्जा-गृह बनाकर वत्सेश्वर के प्रति प्रौढ़ प्रेम में पगे हुए मन को भक्ति-प्रवण बना दिया ॥१९६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुख लम्बक का पंचम तरंग समाप्त। षष्ठ तरंग वत्सराज की कथा कुछ दिनों बाद उसी विन्ध्य-शिविर में रहते हुए वत्सराज के पास चंडमहासेन का प्रति- हार (दूत) आया ॥१॥ आकर और राजा को प्रणाम करके उसने कहा—‘महाराज ! चंडमहासेन ने सन्देश देकर मुझे आपके पास भेजा है और कहलाया है—"तुमने जो वासवदत्ता का हरण किया है यह उचित ही किया है। इसीलिए तुम मेरे द्वारा अपहरण कराकर उज्जैन ले आये गये थे ॥२-३॥ कैद में बँधे हुए मैंने तुम्हें कन्या स्वयं इस शंका से नहीं दी कि तुम सम्भवतः इस प्रकार प्रसन्न न होगे। इसलिए हे राजन् ! मेरी कन्या का विवाह अवैवाहिक न हो इसलिए कुछ प्रतीक्षा करो शीघ्र ही मेरा पुत्र गोपालक वहीं आवेगा और विधिपूर्वक अपनी बहिन का विवाह तुमसे करेगा" ॥४-५॥ इस प्रकार प्रतिहार ने वत्सराज को यह सन्देश सुनाकर वासवदत्ता को भी सुनाया। तब प्रसन्न वासवदत्ता के साथ प्रसन्नचित्त राजा ने कौशाम्बी जाने की इच्छा प्रकट की ॥६॥ २९

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · Page 266 of 876 · BharatKosha