कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बक २१७ ऐसा सुनकर ऋषिपुत्र ने अपनी आयु का आधा भाग देकर उसे जीवित किया और उसके साथ विवाह कर लिया ॥८१॥ विवाह के अनन्तर रुह मुनि सर्पों पर इतना क्रुद्ध हुआ कि वह जहाँ भी किसी सर्प को देखता था उसे मार डालता था—यह समझकर कि इन सर्पों ने मेरी प्रियतमा के प्राणों का हरण किया ॥८२॥ एक बार अपने को मारते हुए ऋषि को देखकर डुंडुभ (पानी का निर्विष साँप) मनुष्य की वाणी में बोला कि 'तुम साँपों पर क्रुद्ध हो तो हम डुंडुभों को क्यों मारते हो? तुम्हारी प्रियतमा को सर्प ने काटा है ॥८३॥ सर्प और डुंडुभ दोनों पृथक् जातियाँ हैं। अहि (सर्प) सदा विषवाले और डंडुभ सदा विष-हीन होते हैं। यह दोनों में भेद है। तब रुह ने उससे पूछा कि 'तुम कौन हो? उत्तर में उसने कहा—'मैं शाप के कारण पतित मुनि हूँ। यह शाप तुमसे वार्तालाप करने तक ही था। ऐसा कहकर उसके अन्तर्धान हो जान पर रुह ने डडुभों को मारना छोड़ दिया ॥८४-८५॥ महारानी ! यही मैंने उपमा के लिए आपसे कहा कि अहियों पर क्रुद्ध आप डुंडुभों को व्यर्थ मारती हैं॥८७॥ इस प्रकार विनोद-मिश्रित हास्य के साथ कहकर वसन्तक के चले आने पर पति के साथ बैठी हुई वासवदत्ता उसके प्रति सन्तुष्ट हुई ॥८८॥ इस प्रकार कामी उदयन कुपिता वासवदत्ता के चरणों में मधुर-मधुर याचना (प्रार्थना) करता हुआ विदूषक वसन्तक के हास्य-कौतकों से रंजित होकर देवी वासवदत्ता के साथ समय व्यतीत करने लगा ॥८९॥ उस सुखी राजा की रसना सदा मद्य में निरत कान वीणा की मधुर झंकारों में तल्लीन और दृष्टि सदा वासवदत्ता के मुख पर निश्चल रहती थी ॥९ ॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर का कथामृत नामक द्वितीय लम्बक समाप्त।