कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextतृतीय लावणक लम्बक प्रथम तरंग वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः) ब्रह्मा भी जगत् के निर्माण की निर्विघ्न सिद्धि के लिए जिसका स्मरण करता है उस विघ्ननाशक गणेश जी को नमस्कार है ॥१॥ प्रिया से निरन्तर लिपटे रहने पर भी शंकर भगवान् त्रिनयन कौतुक हैं उस कामदेव की जय हो ॥२॥ इस प्रकार वासवदत्ता के साथ सांसारिक सुखों का उपभोग करता हुआ वत्सराज एकमात्र वासवदत्ता के प्रति तल्लीन हो गया ॥३॥ राजा का प्रधान मंत्री यौगन्धरायण और सेनापति रुमण्वान् दोनों राज्य भर का भार वहन करते थे (राजकार्य चलाते थे) ॥४॥ एक बार चिन्तित यौगन्धरायण ने रुमण्वान् को रात में अपने घर पर लाकर कहा— यह उदयन पाण्डव-वंश में उत्पन्न हुआ है, यह सारी पृथ्वी कुलपरम्परा से इसकी ही है और राजधानी हस्तिनापुर है ॥५-६॥ पर यह अनुरागी उदयन ने वह सब कुछ छोड़ दिया। अब इसका राज्य केवल उस छोटे से वत्सप्रदेश-मात्र में रह गया है ॥७॥ स्त्री, मद्य और शिकार के व्यसनों में निमग्न यह राजा सब निश्चिन्त रहता है। राज्य की सारी चिन्ता इसने हमारे ऊपर छोड़ रखी है। इसलिए अब हम लोगों को ही यह प्रयत्न करना चाहिए जिससे कुल-परम्परा प्राप्त समस्त पृथ्वी का राज्य इसे पुनः प्राप्त हो सके। ऐसा करने से हम अपनी राज्यभक्ति और बुद्धिमत्ता दोनों को सफल कर सकेंगे। और बुद्धि के द्वारा सब कुछ सिद्ध हो सकता है। इस प्रसंग में एक कथा सुनो ॥८—१० ॥