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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक २४१ निपुण वैद्य की कथा पूर्व समय में महासेन नाम का एक राजा था। वह अत्यन्त बलवान् दूसरे किसी राजा से पराजित कर दिया गया। उसके मन्त्रियों ने स्वार्थवश अपने स्वामी राजा को शत्रु से दंड दिला दिया। दंड प्राप्त होने पर वह आत्माभिमानी राजा--'मुझे शत्रु के आगे प्रणाम करना पड़ा'--इस चिन्ता से अत्यन्त सन्तप्त रहने लगा। इसी शोक के कारण राजा के शरीर में एक गुल्म उत्पन्न हुआ। उससे आक्रान्त राजा मरणासन्न हो गया। एक वैद्य ने उस फोड़े को औषधियों से असाध्य समझकर राजा से झूठ कह दिया कि 'महाराज ! आपकी महारानी मर गई ॥११-१५॥ भीषण संवाद को सुनकर शोक से भूमि पर गिरते हुए राजा का फोड़ा धक्का लगने से स्वयं फूट गया। फोड़ा फूट जाने से राजा धीरे-धीरे स्वस्थ होकर रानी के साथ सांसारिक भोगों का उपभोग करता हुआ पूर्व-शत्रु पर विजय प्राप्त कर सका ॥१६-१७॥ उस वैद्य ने अपनी बुद्धि से उस अवसर पर जिस प्रकार राजहित का साधन किया था उसी प्रकार हमलोग भी करें ॥१८॥ हमारे पृथ्वी-विजय करने में सबसे बड़ा बाधक मगध का राजा प्रद्योत है, जो हमारे पीछे का राजा है। यदि हम विजय करने चल पड़ें पीछे से वह हमारे मूल राज्य पर ही कब्जा कर ले ऐसा सम्भव है॥१९॥ उससे हमारा प्रेम भी नहीं है, वह अवश्य क्रोध करके आक्रमण कर देगा। इसलिए उसकी कन्या पद्मावती है, जो कन्याओं में रत्न है, उसे हम वत्सराज के लिए माँगते हैं ॥२०॥ वासवदत्ता को बुद्धि-बल से कहीं छिपाकर निवास-स्थान में आग लगाकर कह देंगे कि 'वासवदत्ता जल गई' ॥२१॥ वासवदत्ता के रहते मगधराज अपनी कन्या उदयन को न देगा। मेरे एक बार प्रार्थना करने पर उसने यही कहा था कि प्राणों से प्यारी कन्या वत्सराज को न दूँगा क्योंकि वासवदत्ता पर राजा का स्नेह अत्यधिक है॥२२-२३॥ ३१