कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextतृतीय लम्बक २४५ वह बनिया उसी प्रकार स्वीकार करके घर गया और भय के कारण रात में उसने उसी प्रकार किया—अर्थात् कन्या को सन्दूक में बन्द करके नदी में बहा दिया क्योंकि भीरु (डरपोक) लोग विवेकहीन होते हैं॥३९॥ संन्यासी ने भी मठ में रहनेवाले अपने चेलों से कहा कि जाओ नदी में देखो। यदि पीठ पर जलते हुए दीयेवाले बहते हुए सन्दूक को देखना तो उसे चुपचाप मेरे पास लाओ। यदि उसके अन्दर से आवाज भी आती हो तो उसे खोलना मत॥४०-४१॥ जब साधु के चेले गंगा-तट पर पहुंचे तब उससे पहले ही कोई राजपुत्र गंगा तट पर उतरा और उसने उस बनिये के द्वारा दीप जलाकर गंगा में बहाई हुई पेटी को देखा तथा अपने नौकरों से पेटी को मँगाकर खोला तो उसमें हृदय को उन्मत्त कर देनेवाली सुन्दरी कन्या को देखा। राजकुमार ने उस सुन्दरी को निकालकर वहीं उसके साथ तुरन्त गन्धर्व-विवाह कर लिया और पेटी में एक भयानक बन्दर को बन्द करके उसी प्रकार दीप-सहित पेटी को नदी में छोड़ दिया॥४३-४५॥ उस कन्यारत्न को लेकर राजकुमार के चले जाने पर उसी पेटी को खोजते हुए संन्यासी चेलों ने उस पेटी को देखा और उसे निकालकर गुरु के पास ले गये तथा प्रसन्न मुद्रा में गुरु ने उनसे कहा—अकेला ही इस पेटी पर बैठकर मन्त्र सिद्ध करता हूँ और तुमलोग नीचे जाकर रातभर चुपचाप सो जाओ ॥४६-४८॥ ऐसा कहकर उस संन्यासी ने सुन्दरी वैश्य-कन्या की प्राप्ति की उत्कंठा से एकान्त में उस पेटी को खोला। उसे खोलते ही संन्यासी की दुर्नीति के मूर्तिमान स्वरूप के समान एक भीषण बन्दर उससे निकलकर उछला॥४९-५०॥ बन्दर ने निकलते ही दांतों से संन्यासी की नाक और नखों से उसके कान काट लिये। मानों बानर संन्यासी की दुष्टता का दंड देने के लिए ही आया हो। तदनन्तर वह संन्यासी उसी रूप में नीचे उतरा। उसे उस रूप में देखकर उसके शिष्यों ने बड़ी ही कठिनाई से हंसी को रोका॥५१-५२॥ प्रातःकाल यह समाचार जानकर वह बनिया तथा अन्य सभी लोग खूब हँसत रहे। वह वैश्यकन्या एक राजकुमार को सुन्दर पति के रूप में प्राप्त कर आनन्द करने लगी॥५३॥