कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextतृतीय लम्बक २५५ उस राजा के हितैषी गोपालक ने बहिन के लिए अति कष्टप्रद होने पर भी उस योजना को सुनकर अपनी सहमति प्रकट की क्योंकि हितैषी सज्जनों के वचन तो मानने ही चाहिए। इस योजना में सब बातें तो ठीक हैं, किन्तु देवी को जली जानकर अपने प्राणों को त्यागने की चेष्टा करते हुए वत्सराज की रक्षा कैसे की जाय यह विचारणीय प्रश्न है। अच्छे उपाय आदि सभी सामग्री के रहते हुए भी योजना को नष्ट होने से बचाना योजकों का मुख्य अंग है। अर्थात् यदि राजा का अस्तित्व ही न रहा तो योजना का आधार नष्ट हो जायगा ॥१११–११३॥ रुमण्वान् के उस समय पुनः ऐसा कहने पर सारे कामों पर भलीभाँति सोचे-समझे हुए यौगन्धरायण बोला—‘इस विषय में चिन्ता न करनी चाहिए कि महारानी गोपालक की छोटी बहिन राजा को प्राणों से प्रिय है ॥११४–११५॥ उस समय राजा के शोक के कुछ कम होने पर कदाचित् रानी जीवित हो जाय। ऐसी आशा से राजा धैर्य धारण करेगा। और राजा उच्चतम कोटि का जीव है अतः उसका विवाह भी शीघ्र ही हो जायगा फिर उस बीच ही पद्मावती भी दिखा दी जायगी ॥११६-११७॥ इस प्रकार गोपालक रुमण्वान् और यौगन्धरायण परस्पर विचार-विनिमय करते रहे। अन्त में निश्चय हुआ कि हमलोग कोई बहाना बनाकर राजा और रानी के साथ लावानक गाँव को चलें। वह हमारा स्थान सीमा पर तथा मगध के समीप है। सुन्दर शिकारगाह होने के कारण राजा भी शिकार में लगा रहेगा इसी बीच हमलोग रनिवास में आग लगा देंगे किसी उपाय से महारानी को गुप्त रूप से पद्मावती के पास ही छिपा देंगे जिससे वह वासवदत्ता के स्वभाव और चरित्र से परिचित हो जायगी ॥११८–१२१॥ इस प्रकार रात्रि के समय सम्मति करके दूसरे दिन वे सब राजभवन को गये। वहाँ जाकर रुमण्वान् ने वत्सराज से निवेदन किया कि 'देव ! हमलोग लावानक ग्राम में जायें तो बहुत अच्छा हो। वह अति रमणीय स्थान है। वहाँ अच्छे-अच्छे शिकारगाह हैं और वहाँ मद पान की भी बहुतायत है। समीप होने के कारण मगध-नरेश वहाँ सदा बाधा पहुँचाता रहता है। इसलिए उसकी रक्षा के लिए और मनोरंजन के लिए वहाँ चलिए ॥१२२–१२५॥