भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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तृतीय लम्बक १४५ हे विदूषक ! बहुत अच्छा तुम सच्चे वीर पुरुष हो । तुम्हारे जैसा और दूसरा कौन है। तुम्हारे इस धैर्य से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अब तुम सुनो ॥३१३॥ 'इस समय तुम नग्नदेश में आये हो यहाँ से सात दिनों में कर्कोटक नगर में पहुँचोगे । वहाँ पहुँचकर तुम्हें धैर्य प्राप्त होगा तब अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करोगे। तुमने हव्य-कव्य खाने वाले मेरी पहले आराधना की थी ॥३१४ ३१५॥ अब मेरे ही वरदान से तुम्हें भूख-प्यास नही सतावेगी। तुम अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जाओ'—ऐसा कहकर आकाशवाणी बन्द हो गई ॥३१६॥ विदूषक इस आकाशवाणी को सुनकर हर्षित हुआ और अग्नि को प्रणाम करके चला एवं सातवें दिन कर्कोटक नगर में पहुँच गया ॥३१७॥ वहाँ पहुँचकर वह एक मठ में रुका जिसमें श्रेष्ठ अन्न तथा अतिथियों से स्नेह रखने वाले भिन्न-भिन्न देशों के निवासी ब्राह्मण निवास करते थे ॥३१८॥ वह मठ वहाँ के राजा आर्यवर्मा ने बनवाया था और बहुत समृद्ध था ॥३१९॥ उसमें सुवर्ण की सुन्दर देव प्रतिमा थी। मठ के निवासिया ने विदूषक का स्वागत किया। एक ब्राह्मण उस अतिथि (विदूषक) को घर ले गया और घर ले जाकर स्नान भोजन और वस्त्रों से उसकी सेवा की ॥३२०॥ सायंकाल उस मठ में जाकर ठहरे हुए उसने नगाड़े के साथ की जाती हुई यह घोषणा सुनी ॥३२१॥ कि जो कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिय राजकुमारी को ब्याहने के लिए चाहता हो वह आज रात को राजकुमारी के घर में निवास करे ॥३२२॥ यह सुनकर साहसी विदूषक को इस घोषणा में किसी कारण की आशंका न करके रात में वहाँ जाने के लिए तैयार हो गया ॥३२३॥ उसे उद्यत देखकर मठ-निवासी ब्राह्मण ने उसे कहा—हे ब्राह्मण ! ऐसा साहस न करना। वह राजकुमारी का भवन नही वह मृत्यु का खुला हुआ मुँह है। उसमे रात को जो प्रवेश करता है वह जीवित नही रहता अनेक साहसी व्यक्ति गये और मर गए ॥३२४ ३२५॥ उन मठवासी ब्राह्मणों के बहुत मना करने पर भी उनकी बात को अस्वीकार करके विदूषक राजसेवकों के साथ वहाँ गया ॥३२६॥ वहाँ पर राजा आर्यवर्मा ने उसे देखकर अभिनन्दन (स्वागत) किया और रात को वह राजकन्या के शयनागार में इस प्रकार घुसा जैसे रात्रि का रात्रि में सूर्य प्रवेश करता है ॥३२७॥ ४४

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