भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बर १६१ कुछ दिनों तक स्वयं कष्ट पाता हुआ और कुछ व्यापार के लिए श्वशुर से धन पाने की इच्छा से देवदास उनके पास गया॥१२॥ और मैला-कुचैला धूल से भरा हुआ वह सायंकाल पौण्ड्रवर्धन नगर में पहुँचा। अपनी ऐसी स्थिति देखकर सोचने लगा कि इस हालत में ससुराल कैसे जाऊँ। दरिद्र व्यक्ति के लिए मर जाना अच्छा है, किन्तु अपने सम्बन्धियों के आगे दीनता प्रदर्शन उचित नहीं ॥२१-२२॥ ऐसा सोचकर वह बाजार में आकर किसी दूकान के बाहर चौंतरे पर रात में कमल के समान सिमटकर पड़ा रहा॥२३॥ कुछ ही देर बाद उसने दूकान का दरवाजा खोलकर उसमें घुसते हुए किसी युवक वैश्य को देखा। कुछ ही समय के बाद एक पांथा आई हुई और जल्दी से दूकान में घुसी किसी स्त्री को देखा ॥२४-२५॥ दूकान के अन्दर जलते हुए दीप के प्रकाश से दरवाजे की दरार से जब उसने अन्दर झाँका तब अपनी पत्नी को देखा और पहचान लिया॥२६॥ अन्दर से द्वार बन्द करके अन्य पुरुष के संसर्ग में अपनी पत्नी को देखकर उस पर मानों वज्रपात-सा हुआ और वह सोचने लगा॥२७॥ बुरे व्यसनों के समूह में पड़े हुए पुरुष के लिए ऐसी विपत्तियाँ सुलभ हैं। धनहीन व्यक्ति शरीर को भी बेच देता है, स्त्रिया की तो बात ही क्या जिसका जीवन स्वभावतः विद्युत् के समान चंचल होता है? ॥२८॥ पिता के घर में रहनेवाली स्वतन्त्र स्त्री की यही गति होती है॥२९॥ ऐसा सोचता वह बाहर बैठा हुआ अपनी स्त्री तथा उसके उपपति का गुप्त वार्तालाप सुनने लगा॥३०॥ उसने दूकान के द्वार पर जाकर कान लगाया तो वह पापिन स्त्री एकान्त में उस अपने उपपति वैश्य से कह रही थी कि तेरे प्रति मेरा प्रेम है, इसलिए कहती हूँ सुनो॥३१॥ मेरे पति का परदादा वीरवर्मा था उसने अपने घर के आँगन के चारों कोनों में सोने की अशर्फियों से भरे चार घड़े छिपाकर गाड़े हैं। यह बात उसने अपनी एक स्त्री से कही थी उस स्त्री ने मरने के समय उसकी बहू (पतोहू) से बता दी। उसने अपनी बहू (मेरी सास) को यह बतलाया और मेरी सास ने मुझसे कहा। इस प्रकार मेरे पति के कुल में सासों के द्वारा इस धन की जानकारी के लिए परम्परा चल रही है॥३२-३५॥ ४१