कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक १२१ महाराज ! इस प्रकार डाकिनियों की चक्रवर्तिनी होकर मैंने सहेलियों के साथ बहुत-से मनुष्यों का मांस खाया ॥११४॥ कालरात्रि की कथा महाराज ! इसी कथा के बीच एक और कथा सुनो। हमारी उस गुरुपत्नी कालरात्रि का पति विष्णुदत्त नाम का ब्राह्मण था। वह एक प्रसिद्ध अध्यापक और वेद-विद्या विशारद था और दूर-दूर देश से आते हुए शिष्यों को पढ़ाता था ॥११५-११६॥ विष्णुदत्त के शिष्यों में सुन्दरक नामक एक युवक शिष्य था जो बहुत ही विनयी और सदाचारी था॥११७॥ एक बार विष्णुदत्त की पत्नी उस कालरात्रि ने मोहित कर एकान्त में सुन्दरक से अनुचित प्रस्ताव किया जबकि उसके पति कहीं बाहर चले गये थे ॥११८॥ यह सच है कि हँसने योग्य कुरूप व्यक्तियों से कामदेव क्रीड़ा करता है अर्थात् हास्य करता है। तभी तो कुरूपा कालरात्रि ने अपने रूप को न देखकर सुन्दरक को चाहा ॥११९॥ प्रार्थना करने पर भी सुन्दरक ऐसा कुकृत्य करना नहीं चाहता था। स्त्रियाँ चाहे जितनी चेष्टाएँ करें किन्तु सज्जनों का मन हिलता नहीं ॥१२० ॥ सुन्दरक के हाथ न लगने पर कालरात्रि ने क्रोध से दाँतों और नखों से अपने अंगों को काटा और नोंच-खसोट डाला ॥१२१॥ वह कपड़ों और बालों को बिखेरे हुए रो रही थी। उसी बीच उसका पति विष्णुस्वामी घर आया ॥१२२॥ उसके आते ही उसने पति से कहा—'देखो बलात्कार करने की चेष्टा में सुन्दरक ने मेरी यह हालत बना डाली है' ॥१२३॥ यह सुनकर अध्यापक विष्णुस्वामी क्रोध से जल उठा। सत्य है, स्त्रिया पर विश्वास करना विद्वानों की भी विचार-शक्ति को नष्ट कर देता है ॥१२४॥ सायंकाल सुन्दरक के घर आने पर विष्णुस्वामी ने अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे दौड़ा- कर मुक्कों लातों और डंडों से खूब पीटा ॥१२५॥ मार खाकर बेहोश सुन्दरक को गुरु ने रात में बाहर गली में लापरवाही से फेंकवा दिया ॥१२६॥ रात की ठंडी वायु से होश में आये सुन्दरक ने अपनी अवस्था को देखा और वह सोचने लगा ॥१२७॥