कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक ३२१ जिस प्रकार आँधी निर्मल जलवाले तालाबों को क्षुब्ध और मलिन कर देती है, उसी प्रकार स्त्री की प्रेरणा रजोगुणी पुरुषों के निर्मल हृदय को क्षुब्ध कर डालती है। इसी कारण मूढ़ और विद्वान् गुरु ने बिना विचारे अति क्रोध से मेरे विरुद्ध भयंकर व्यवहार किया ॥१२८-१२९॥ यह भी बात है कि इस सृष्टि के आरम्भ काल से ही मोक्ष-मार्ग के विरोधी काम और क्रोध ब्राह्मणों में दैवयोग से प्रकृति-सिद्ध होते हैं ॥१३० ॥ जैसे पूर्वकाल में अपनी स्त्रियों के नष्ट होने की शंका से देवदारु-वन में मुनिगण शिवके ऊपर क्रुद्ध हो गये थे। उन्होंने पार्वती को ऋषियों की अमान्यता दिखलाते हुए क्षपणक रूप धारी शिव को नहीं पहिचाना। शिवजी के शाप देने पर तीनों जगत् को हिला देनेवाले शिवजी को पहचान करके वे लोग फिर शिवजी की शरण में गये ॥१३१-१३३॥ इस प्रकार काम क्रोध आदि छह शत्रुओं से ठगे हुए ऋषिगण भी जब मोहित हो जाते हैं तब वेदपाठी ब्राह्मणों की तो बात ही क्या ? ॥१३४॥ इस प्रकार सोचता हुआ सुन्दरक रात को चोर डाकुओं के भय से पास की सूनी गोशाला में जाकर ठहरा ॥१३५॥ वह गोशाला के एक कोने में अभी बैठ ही रहा था कि उस मकान में कालरात्रि आ पहुँची ॥१३६॥ वह छुरी लिए हुए भीषण फूत्कार करती हुई आँखों और मुख से आग की ज्वाला फेंक रही थी और अनेक डाकिनियों के झुंड के साथ थी ॥१३७॥ इस प्रकार आई हुई कालरात्रि को देखकर डरा हुआ सुन्दरक राक्षसों का नाश करने- वाले मन्त्रों का जप करने लगा ॥१३८॥ उसके मन्त्र-जप से मोहित कालरात्रि ने भय से एक कोने में छिपुड़े हुए उसे नहीं देखा ॥१३९॥ तदनन्तर डाइन सहेलियों के साथ उस कालरात्रि ने उड़ने का मन्त्र पढ़ा और गौओं के बाड़े के नाल उड़कर आकाश-मार्ग से उज्जयिनी चली गई। उसी समय सुन्दरक ने सुनकर उसके मंत्र को जान लिया ॥१४०-१४१॥ ५