कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक ६९९ मित्रों के साथ उड़कर वह प्रयाग पहुँचा और थक गया। प्रयाग में उसने स्नान करते हुए किसी राजा को देखा ॥१७२॥ वहाँ पर राजभवन को रोककर सातो द्वारा आश्चर्य से देखा जाता हुआ सुन्दरक आकाश से गंगा में कूद पड़ा और राजा की ओर गया ॥१७३॥ राजा ने सभ्यता से पूछा—'तुम कौन हो ? और आकाश से क्यों उतरे हो ? तब सुन्दरक बोला— मैं शिवजी का मूरजक नाम का गण हूँ। मनुष्यों के भोग भोगने के लिए उनकी आज्ञा से तुम्हारे पास आया हूँ। यह सुनकर और उसे सच मानकर राजा ने उसे अन्न धन स्त्री रत्न आदि से भरा हुआ एक नगर मनुष्य-भोग के लिए दे दिया ॥१७४-१७६॥ उस नगर में आकर अपने मित्रों के साथ आकाश में उड़कर सुन्दरक चिरकाल के लिए स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करने लगा ॥१७७॥ सोने के पलंगों पर सोता हुआ चँवरो से डलावा जाता हुआ एवं सुन्दरी स्त्रियों से सेवित वह इन्द्र के समान सुख भोगने लगा ॥१७८॥ एक बार, किसी आकाशचारी सिद्ध ने उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर उसे आकाश से उतरने का मन्त्र भी दे दिया। उतरने का मन्त्र प्राप्त कर वह सुन्दरक उड़कर अपने देश कान्य- कुब्ज (कन्नौज) में उतरा। उसे नगर के साथ पूर्ण लक्ष्मी से युक्त एवं आकाश से उतरते हुए जानकर कान्यकुब्ज का राजा स्वयं उसके समीप आया। राजा ने उसे पहचानकर पूछा तो उसने अवसर समझकर कालरात्रि का सारा कृत्य उसे सुना दिया। तब राजा ने कालरात्रि को बुलवाकर पूछा। उसने भी निर्भय होकर अपनी दुष्टता बता दी और स्वीकार किया ॥१७९-१८४॥ राजा क्रुद्ध होकर उसके कान काटने के लिए जैसे ही उद्यत हुआ वैसे ही सबके देखते- देखते पकड़ी हुई कालरात्रि गुम हो गई ॥१८०॥ तब राजा ने अपने राज्य से उसके निर्वासन की आज्ञा दे दी और राजा से सम्मानित सुन्दरक फिर आकाश में उड़ गया ॥१८५॥ रानी कुवलयावली राजा आदित्यप्रभ को इस प्रकार कथा सुनाकर बोली—'महाराज ! डाकिनी-तन्त्रों की सिद्धियाँ इसी प्रकार की होती हैं ॥१८६-१८७॥