कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक (मंगल-श्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।) प्रथम तरंग राजा उदयन की कथा (क्रमशः) कर्णताल के प्रबल आघातों से दुःस्वप्नों को एक ओर करके मानों सफलता का मार्ग प्रदर्शन कर रहे हों ऐसे विघ्नराज गणेश की जय हो॥१॥ तदनन्तर कौशाम्बी में रहता हुआ राजा उदयन विजित पृथ्वी का एकच्छत्र राज्यभोग कर रहा था॥२॥ वह राजा सेनापति रुमण्वान् के साथ मुख्यमन्त्री यौगन्धरायणपर समस्त राज्य-शासन का भार देकर, अपने नर्मसचिव वसन्तक के साथ सुखपूर्वक सांसारिक भोग-विलास का आनन्द लेने लगा॥३॥ वह स्वयं वीणा बजाता हुआ रानी वासवदत्ता और पद्मावती के साथ संगीत का सेवन करता था॥४॥ वासवदत्ता के सूक्ष्म और मधुर संगीत-स्वर उसकी वीणा के स्वर की एकता (समता) होने पर बजाने के लिए चलते हुए अँगूठे से ही दोनों का भेद लक्षित होता था। अर्थात् गायन और वादन का स्वर एक साथ मिलने पर यह प्रतीत नहीं होता था कि रानी गा रही है या वीणा बज रही है॥५॥ राजमहल के सामने अपनी कीर्ति के समान शुभ चाँदनी से धवल बरामदे में बैठकर वह राजा प्याला में अनवरत धारा से गिरते हुए मद्य का समुद्र के मद के समान पान करता था॥६॥ उस एकान्त स्थान में बैठे हुए राजा के लिए सुन्दरियाँ मद्य के घड़ा में रूप से उज्ज्वल मद्य को ऐसे पहुँचा रही थीं मानों कामदेव के राज्याभिषेक के लिए स्वर्ण के कलशों में तीर्थों का जल लाया जा रहा हो॥७॥ वह राजा दोनों रानियों के बीच में बैठकर अपने रागपूर्ण चित्त के समान रक्तवर्ण स्वादु, स्वच्छ और रानियों के मुखों से प्रतिबिम्बित मद्य का प्रसन्नपूर्वक पान करता था॥८॥ ईर्ष्या और कोष के बिना भी (मद्य के नशे में) टेढ़ी भौंहोंवाले एवं प्रेमपूर्ण रानियों के मुखों को निरन्तर देखते हुए राजा को तृप्ति नहीं होती थी॥९॥ ९२