भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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चतुर्थ लम्बक ४२१ ऐसा सोचकर उसने उपपति के साथ उस स्त्री की उपेक्षा कर दी। शत्रु-विजय की प्रबल इच्छा रखनेवाले सज्जनों के हृदय में स्त्री-रूपी तृण का क्या महत्त्व है॥८१॥ उसी समय विहार की हलबल में उस बनिये की बेटी का मणियों से जड़ा हुआ कान का बहुमूल्य आभूषण (तरङ्गी) कहीं गिर पड़ा। जाने की शीघ्रता में उसने गिरे हुए कान के आभूषण को नहीं देखा और वह अपने प्रेमी से आज्ञा लेकर अपने घर चली गई॥८२-८३॥ कुछ समय के उपरान्त उस प्रेमी के भी चले जाने पर राजकुमार ने उस जड़ाऊ गहने को उठा लिया॥८४॥ चमकीले रत्नों की चमचमाती हुई किरणात्मक बहुमूल्य मणियों से जड़ा हुआ वह आभूषण विनष्ट राज्यलक्ष्मी को ढूंढ़ने में सहायक हाथ के दीपक के समान दैव ने मानो राजकुमार के हाथ में दे दिया था॥८५॥ गृहगमनोत्सुक राजकुमार वहाँ से निकलकर उसी समय कान्यकुब्ज (कन्नौज) देश को चला गया॥८६॥ राजकुमार कन्नौज जाकर कान के उस आभूषण का एक भाग मुहरों पर बन्धक (गिरवी) रखकर उस धन से हाथी घोड़े आदि खरीदकर राजोचित ठाट-बाट से कान्यकुब्ज के चक्रवर्ती के समीप गया॥८७॥ उनसे मिलकर और सहायता-स्वरूप उनकी सेनाओं को लेकर वह शत्रुओं पर चढ़ आया। कठिन युद्ध में विजयी होकर उसने पिता का राज्य प्राप्त किया और माता ने भी उसका अभिनन्दन किया॥८८॥ राज्य प्राप्त करने पर उसने बन्धक का रुपया देकर पत्नी के उस कर्णाभूषण को छुड़ा लिया और अपनी पत्नी का रहस्य प्रकट करने के लिए उस आभूषण को अपने श्वशुर के पास भेज दिया। वह वैश्य इस प्रकार अपनी कन्या के कर्णाभूषण को पाकर घबराया हुआ उसके पास गया और उसे दिखाया॥८९ ॥ वह वैश्यपुत्री उसे देखकर और वह भी पति के द्वारा भेजा हुआ जानकर, अत्यन्त व्याकुल हुई॥ ९० ॥ 'मेरे कान का यह आभूषण उस दिन रात को धर्मशाला के भीतर गिर गया था जिस दिन जैन किसी अज्ञात पथिक का डेरा था॥ ९१ ॥ अवश्य ही वह मेरा पति था जो मेरा चरित्र जानने की इच्छा से छिपकर आया था। मैंने उसे नहीं पहिचाना। बस उसी ने यह कर्णाभूषण वहाँ पाया होगा॥ ९२॥ इस प्रकार सोचते हुए पश्चात्ताप से व्याकुल उस वैश्य-कन्या का हृदय उसी समय फट गया और वह मर गई॥ ९३॥ तदनन्तर उसके रहस्य को जाननेवाली उसकी अंगरक्षक दासी से युक्तिपूर्वक सब वृत्तान्त कहकर उसके पिता ने भी उसके मरने पर दुःख नहीं मनाया। प्रत्युत उसका अच्छा कल्याण ही मनाया॥ ९४ ॥

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