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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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चतुर्थ लम्बक ४५१ उस गर्भवती रानी का मुख चन्द्रमा के समान शोभित होने लगा। उस मुख में नेत्र चंचल थे। उसकी आभा कुछ पीलापन लिये हुई थी मानों चन्द्रमा अपने मित्र कामदेव के प्रेम से आकर, रानी के मुँह में निवास करने लगा था॥२॥ उस रानी के मणियम पलंग के दोनों ओर पति 'कामन्द' के प्रेम से आई हुई रति और प्रीति दोनों पत्नियां मानों प्रतिमा के रूप में चमकती थीं॥३॥ ऐसा लगता था कि विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती उस गर्भस्थ बालक की सेवा के लिए आई हुई विद्याएं रानी की सेवा कर रही थीं॥४॥ रानी मानों गर्भस्थ बालक के अभिषेक के लिए गहरे हरे रंग के नवपल्लवों के समान श्याम मुखवाले दो कुचों को कलशों के सदृश वहन करती थी॥५॥ स्वच्छ चमकीले और प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेवाली भूमि से युक्त शयन-गृह में सुखद शय्या पर सोई हुई रानी बहुत ही भली मालूम पड़ती थी॥६॥ वह रानी मानों उत्पन्न होनेवाले बालक की सुन्दर कान्ति से पराजित होने के भय से चंचल पानीवाले रत्नों की राशि से शोभित हो रही थी। (अर्थात् उसके शरीर पर धारण किये हुए बहुमूल्य रत्नों का पानी चंचल हो रहा था झलमल-झलमल कर रहा था) ॥७॥ भवन के मध्य में जल हुए रत्न के अन्दर दीखती हुई छाया ऐसी मालूम होती थी कि मानो गतस्थ चक्रवर्ती को प्रणाम करने के लिए विद्याधरों की राजलक्ष्मी आकाश से उतर रही हो॥८॥ वह गर्भवती रानी मन्त्रसिद्धि में लगे हुए साधकों की कथाओं तथा इसी प्रकार की बातों में रुचि रखती थी॥९॥ मरण बात गाती हुई विद्याधरों की सुन्दर रमणियां स्वप्न में रानी की स्तुति करती हुई दीखती थीं॥१०॥ रानी जागने पर भी आकाश में उड़कर विहार करने और भूमि के कौतुक (तमाशे) देखने की इच्छा करती थी॥११॥ मन्त्री यौगन्धरायण तन्त्र मन्त्र और ऐन्द्रजालिक प्रयोगों से रानी की इच्छा को पूरी करता था॥१२॥ नागरिक स्त्रियों की आँखों को आश्चर्य देनेवाले उन आकाश-विहार के प्रयोगों से वह आकाश में विहार करती थी॥१३॥ एक बार जब अपने भवन में बैठी हुई थी उसके हृदय में विद्याधरों की उदारतापूर्ण कथा सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई॥१४॥ तब उस रानी की प्रार्थना पर सभी लोगों के सामने यौगन्धरायण ने यह कथा कही॥१५॥