कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक १९ व्याडि की कथा हे माता ! वेतस नामक नगर में देवस्वामी और करम्भक नाम के दो ब्राह्मण भाई थे व परस्पर अत्यन्त प्रेमपूर्वक रहते थे ॥४१॥ उन दोनों में एक का पुत्र यह इन्द्रदत्त और दूसरे का पुत्र व्याडि नामक मैं हूँ। मेरे जन्म के पश्चात् मेरे पिता का देहान्त हो गया ॥४२॥ भाई के शोक से इन्द्रदत्त के पिता भी स्वर्ग को प्रयाण कर गये। पतियों के शोक से हम दोनों की माताओं के हृदय भी विदीर्ण हो गये—अर्थात् वे मर गईं ॥४३॥ इस प्रकार हम दोनों अनाथ हो गये। इस हाल पर भी विद्या-प्राप्ति की अभिलाषा से हमलोग तपस्या द्वारा स्वामी कार्तिक को प्रसन्न करने गये ॥४४॥ तपस्या करते हुए हमलोगों को स्वप्न में स्वामी कार्तिक ने आदेश दिया कि राजा नन्द का पाटलिपुत्र नामक एक नगर है ॥४५॥ उस नगर में वर्ष नाम का एक ब्राह्मण है। उसके समीप जाकर तुमलोग समस्त विद्याओं को प्राप्त कर सकते हो, अतः तुम दोनों वहीं जाओ ॥४६॥ ऐसा जानकर हम दोनों पाटलिपुत्र गये। वहाँ पूछने पर ज्ञात हुआ कि यहाँ वर्ष नाम का एक मूर्ख रहता है। ऐसा आश्चर्यजनक समाचार लोगों ने दिया ॥४७॥ तब भी संशयान्वित मन से उसी समय हमलोगों ने जाकर वर्ष के जीर्ण-शीर्ण और पुराने घर को देखा ॥४८॥ वर्ष का घर चूहे के बिलों और छविविहीन भित्तियों के कारण टूटे-फूटे छप्परों से भी हीन ऐसा लगता था मानो आपत्तियों का जन्मस्थान हो ॥४९॥ उस मकान के भीतर हमलोगों ने ध्यानमग्न वर्ष को देखा। उसके पश्चात् हम आतिथ्य सत्कार करनेवाली उसकी स्त्री के समीप गये ॥५०॥ भूरे और रूखे शरीरवाली फटे पुराने और मलिन वस्त्र पहिने हुए मतिमती धृति के समान उसकी स्त्री थी ॥५१॥ उसकी पत्नी को प्रणाम कर हमलोगों ने अपने आने का कारण और समाचार कहा और यह भी कह दिया कि सारे नगर में आपके पति मूर्ख-रूप में कुख्यात हैं ॥५२॥ हमारी बातें सुनकर वर्ष की पत्नी ने कहा—पुत्रो ! तुम मेरे पुत्र के समान हो। तुमसे लज्जा या संकोच करने की क्या आवश्यकता है। ऐसा कहकर उस पतिव्रता ने हमें यह कथा सुनाई ॥५३॥ वर्ष का चरित्र इस पाटलिपुत्र नगर में शङ्करस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसके दो पुत्र हुए, एक मेरा पति वर्ष और दूसरा उपवर्ष ॥५४॥