कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
प्रथम लम्बक १९
प्रथम लम्बक १९ व्याडि की कथा हे माता ! वेतस नामक नगर में देवस्वामी और करम्भक नाम के दो ब्राह्मण भाई थे व परस्पर अत्यन्त प्रेमपूर्वक रहते थे ॥४१॥ उन दोनों में एक का पुत्र यह इन्द्रदत्त और दूसरे का पुत्र व्याडि नामक मैं हूँ। मेरे जन्म के पश्चात् मेरे पिता का देहान्त हो गया ॥४२॥ भाई के शोक से इन्द्रदत्त के पिता भी स्वर्ग को प्रयाण कर गये। पतियों के शोक से हम दोनों की माताओं के हृदय भी विदीर्ण हो गये—अर्थात् वे मर गईं ॥४३॥ इस प्रकार हम दोनों अनाथ हो गये। इस हाल पर भी विद्या-प्राप्ति की अभिलाषा से हमलोग तपस्या द्वारा स्वामी कार्तिक को प्रसन्न करने गये ॥४४॥ तपस्या करते हुए हमलोगों को स्वप्न में स्वामी कार्तिक ने आदेश दिया कि राजा नन्द का पाटलिपुत्र नामक एक नगर है ॥४५॥ उस नगर में वर्ष नाम का एक ब्राह्मण है। उसके समीप जाकर तुमलोग समस्त विद्याओं को प्राप्त कर सकते हो, अतः तुम दोनों वहीं जाओ ॥४६॥ ऐसा जानकर हम दोनों पाटलिपुत्र गये। वहाँ पूछने पर ज्ञात हुआ कि यहाँ वर्ष नाम का एक मूर्ख रहता है। ऐसा आश्चर्यजनक समाचार लोगों ने दिया ॥४७॥ तब भी संशयान्वित मन से उसी समय हमलोगों ने जाकर वर्ष के जीर्ण-शीर्ण और पुराने घर को देखा ॥४८॥ वर्ष का घर चूहे के बिलों और छविविहीन भित्तियों के कारण टूटे-फूटे छप्परों से भी हीन ऐसा लगता था मानो आपत्तियों का जन्मस्थान हो ॥४९॥ उस मकान के भीतर हमलोगों ने ध्यानमग्न वर्ष को देखा। उसके पश्चात् हम आतिथ्य सत्कार करनेवाली उसकी स्त्री के समीप गये ॥५०॥ भूरे और रूखे शरीरवाली फटे पुराने और मलिन वस्त्र पहिने हुए मतिमती धृति के समान उसकी स्त्री थी ॥५१॥ उसकी पत्नी को प्रणाम कर हमलोगों ने अपने आने का कारण और समाचार कहा और यह भी कह दिया कि सारे नगर में आपके पति मूर्ख-रूप में कुख्यात हैं ॥५२॥ हमारी बातें सुनकर वर्ष की पत्नी ने कहा—पुत्रो ! तुम मेरे पुत्र के समान हो। तुमसे लज्जा या संकोच करने की क्या आवश्यकता है। ऐसा कहकर उस पतिव्रता ने हमें यह कथा सुनाई ॥५३॥ वर्ष का चरित्र इस पाटलिपुत्र नगर में शङ्करस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसके दो पुत्र हुए, एक मेरा पति वर्ष और दूसरा उपवर्ष ॥५४॥
२ कथासरित्सागर
२ कथासरित्सागर
अथ मूर्खो दरिद्रश्च विपरीतोऽस्य चानुजः। तेन चास्य नियुक्ताभूत् स्वभार्या गृहपोषणी ॥५५॥ कदाचिदथ सम्प्राप्ता प्रावृट् तस्यां च योषितः। सगुडं पिष्टरचितं गृह्यकूपं जुगुप्सितम् ॥५६॥ कृत्वा मूर्खाय विप्राय ददत्यन्नं कृतं हि ताः। शीतकाल निवाणे च स्नानक्लप्तफलमापहम् ॥५७॥ दत्तं न प्रतिपद्यन्त इत्याचारो हि कुत्सितः। सद्येवरगृहिण्या मे दत्तमस्मै सदक्षिणम् ॥५८॥ तद्गृहीतवायमायातो मया निर्भर्त्सितो भृशम्। मूढभावकृतेनान्तर्मन्युना पर्यतप्यत ॥५९॥ सतु स्वामिकुमारस्य पादमूलं गतोऽभवत्। तपस्तुष्टेन तेनास्य सर्वा विद्या प्रकाशिता ॥६०॥ सकृच्छ्रुतधरं विप्रं प्राप्यतास्त्व प्रकाशय। इत्यादिष्टः स तेनैव सहर्षोऽप्यमिहागतः ॥६१॥ आगत्यैष च वृत्तान्तं सर्व मह्यं न्यवेदयत्। तदा प्रभृत्यविरतं जपन्मध्यास्य तिष्ठति ॥६२॥ अतः श्रुतधरं कञ्चिदन्विष्यनयतं युवाम्। तेन सर्वार्थसिद्धिवों भविष्यति न संशयः ॥६३॥ श्रुत्वैतद्वर्षपत्नीतःसूनं योगत्यहामये। दत्त्वा हेमशतं चास्य निर्गतौ स्वस्ततः पुरात् ॥६४॥ अथावां पृथिवीं भ्रान्तौ न च श्रुतधरः क्वचित्। लभ्यमानो तत श्रान्तौ प्राप्तावद्य गृहं तव ॥६५॥ एकश्रुतधरः प्राप्तो यासोऽयं तनयस्तव। तदनं देहि गच्छावो विद्याद्रविण¹-सिद्धये ॥६६॥ इति व्याडिबचः श्रुत्वा मन्माता सादराऽवदत्। मम सङ्गतमेवैतदस्यच प्रत्ययो मम ॥६७॥ तथाहि पूर्वं जातेऽस्मिन्नेकपुत्रे मम स्फुटा। गगनादवभून्मूर्द्धशरीरा सरस्वती ॥६८॥
१ विद्यारूपं यद् द्रविणं = धनं तस्य लाभायेत्यर्थः।
प्रथम लम्बक २१
प्रथम लम्बक २१ उन दोनों में बड़ा पुत्र मूर्ख और दरिद्र था। छोटा उपवर्ष इसके विपरीत विद्वान् और धनी हुआ। उस उपवर्ष ने प्रारम्भ में वर्ष के घर की व्यवस्था करने के लिए अपनी पत्नी को नियुक्त किया था॥५५॥ इसी क्रम से रहते हुए एक बार वर्षा-ऋतु आ गई, जिसमें स्त्रियाँ गुड़ के साथ आटे से निर्मित मूषक का रूप बनाकर निन्दनीय रूप से मूर्ख ब्राह्मणों को दान देती हैं। इसी प्रकार शीत और ग्रीष्म-ऋतु में क्रमशः स्नान और पसीने के कष्ट को हरण करने वाली वस्तुएँ दान करती हैं। इस प्रकार के दान को नहीं लिया जाता। यह अत्यन्त कुत्सित आचार है। वह दान तो मेरे देवर की पत्नी ने दक्षिणा-सहित मेरे पति वर्ष को मूर्ख समझकर दिया॥५६, ५७ ५८॥ उसे लेकर जब वे घर आये तो मैंने उन्हें खूब फटकारा। अपनी मूर्खता के कारण होनेवाले सन्ताप से वे अत्यन्त सन्तप्त हुए॥५९॥ इसके पश्चात् वर्ष तपस्या से स्वामी कार्त्तिक को प्रसन्न करने चले गये। प्रसन्न होकर स्वामी कार्त्तिक ने उन्हें वरदान द्वारा समस्त विद्याएँ प्रदान कीं॥६०॥ और स्वामी कार्त्तिक ने आदेश दिया कि एक बार सुनकर स्मरण रखनेवाले ब्राह्मण को प्राप्त कर तुम इन विद्याओं को प्रकट करना। इस प्रकार कार्त्तिकेय से वरदान प्राप्त कर वर्ष हर्षपूर्वक यहाँ आ गये॥६१॥ वहाँ से आकर उन्होंने समस्त वृत्तान्त मुझे बताया और तभी से वे निरन्तर जप और ध्यान में मग्न रहते हैं॥६२॥ इसलिए आपलोग एक बार ही सुनकर स्मरण रखनेवाले किसी छात्र को ढूँढ़ें। इससे तुम दोनों की मनस्कामना पूर्ण होगी इसमें सन्देह नहीं॥६३॥ वर्ष की पत्नी से इस प्रकार सुनकर हम दोनों ने उसकी तात्कालिक दरिद्रता दूर करने के लिए उसे एक सौ स्वर्ण-मुद्राएँ दीं और उस नगर से चले गये॥६४॥ तदनन्तर हम दोनों सारी पृथ्वी पर घूमे किन्तु कहीं भी एक श्रुतधर नहीं मिला। अतः थककर आज तुम्हारे घर विश्राम के लिए रुक गये॥६५॥ आज इस बालक को जो तुम्हारा पुत्र है प्राप्त किया। जो श्रुतधर है। तुम इसे हमें दे दो। हमलोग विद्या-दान की सिद्धि के लिए जायें॥६६॥ इस प्रकार व्याडि के वचन सुनकर मेरी माता ने आदर के साथ कहा—यह सब ठीक है। मुझे आपकी बातों पर विश्वास है॥६७॥ और भी कारण है। जब यह एकमात्र पुत्र मुझसे उत्पन्न हुआ था उस समय आकाश से देववाणी हुई थी॥६८॥
१२ कथासरित्सागर
१२ कथासरित्सागर
एष श्रुतधरो जातो विद्यां वर्षादवाप्स्यति। किञ्च व्याकरणं लोके प्रतिष्ठां प्रापयिष्यति॥६९॥ नाम्ना वररुचिञ्चायं सत्तदस्म हि रोचते। यद्यद्वरं भवत्विच्छ्विदित्युक्त्वा वागुपारमत्॥७०॥ अतएव विवृद्धेऽस्मिन्नार्य्य चिन्तयाम्यहम्। क्व स वर्ष उपाध्यायो भवदिति न्विशानिशम्॥७१॥ अथ युष्मन्मुखाज्ज्ञात्वा परितोषोऽद्य मे परः। तदेनं नयतं भ्रात्रा युवयोरप का क्षतिः॥७२॥ इति मन्मातृवचनं श्रुत्वा तौ हर्षनिर्भरौ। व्याडीन्द्रदत्तौ तां रात्रिमयुष्येतां क्षणोपमाम्॥७३॥ प्रभातोत्सवार्यमम्बामास्तॄण दत्वा निजं धनम्। व्याडिनोपनीतोऽहं मैवाकृत ममाञ्चता॥७४॥ ततो मात्राम्यनुज्ञातः कथम्चिद्रुद्धवाष्पया। गामादाय निजोत्साहमित्ताधपत्तदव्ययम्॥७५॥ मन्यमानौ च कौमारं पुष्यितं तदनुग्रहम्। व्याडीन्द्रदत्तौ तरसा नगर्य्या प्रस्थितौ ततः॥७६॥ अथ क्रमेण वर्षस्य वय प्राप्ता गृहं गुरोः। स्कन्दप्रसादामायान्तं मूर्त्तं मां सोऽप्यमन्यत॥७७॥ कृत्वास्मानग्रतोऽन्येद्युरुपविष्टः शुचौ भुवि। वर्षोपाध्याय ओङ्कार²मकरोद्दिव्यया गिरा॥७८॥ तदनन्तरमवास्य वेदाः साङ्गा उपस्थिताः। अध्यापयितुमस्मांश्च प्रवृत्तोऽभूदसौ ततः॥७९॥ सकृच्छ्रुतं मया तत्र द्विःश्रुतं व्याडिना तथा। त्रिःश्रुतं चेन्द्रदत्तेन गुरुजोक्तमगृह्यत॥८०॥ ध्वनिमय तमपूर्वं दिव्यमाकर्ण्य सद्यः सपदि विह्रसदन्तर्विस्मया विप्रवर्याः। किमिदमिति समन्ताद्वृद्धमभ्येत्य वर्षं स्तुतिमुखरमुखैरीरयंति स्म प्रणामैः॥८१॥
१ स्वामिकार्तिक सम्बन्धि। २ ओङ्कारोच्चारणम्।
प्रथम लम्बक २३
प्रथम लम्बक २३ यह धूतवर बालक उत्पन्न हुआ है और वर्ष उपाध्याय से विद्या प्राप्ति कर संसार में व्याकरण की प्रतिष्ठा करेगा॥६९॥ यह बालक नाम से वररुचि होगा। संसार में जो भी अच्छा होगा वह इसे अच्छा लगेगा इसीलिए इसका नाम वररुचि होगा। इतना कहकर आकाशवाणी समाप्त हो गई॥७०॥ इसलिए जैसे जैसे यह बालक बड़ा हो रहा था वैसे ही वैसे मुझे रात-दिन यह चिन्ता सता रही थी कि वह वर्ष उपाध्याय कहाँ होगा॥७१॥ आज तुमलोगों के मुख से यह वृत्तान्त सुनकर मुझे अत्यन्त सन्तोष हुआ। अतः तुम दोनों इसे वर्ष के समीप ले जाओ। यह तुम्हारा भाई है। कोई हानि नहीं॥७२॥ मेरी माता के ऐसे वचन को सुनकर प्रफुल्लित व्याडि और इन्द्रदत्त ने वह रात एक क्षण के समान व्यतीत की॥७३॥ प्रातःकाल व्याडि ने उत्सव करने के लिए अपना धन मेरी माता को दे दिया और मुझे वेदाध्ययन के योग्य बनाने के लिए स्वयं ही मेरा उपनयन-संस्कार किया जिससे मैं योग्य बनकर विद्याध्ययन कर सकूँ॥७४॥ तब किसी प्रकार आँसुओं को रोककर मेरी माता ने मुझे आज्ञा दी। साथ ही मेरे अत्यन्त उत्साह को देखकर मेरी माता का शोक कम हो गया॥७५॥ मेरी कुमारावस्था को माता का अनुग्रह समझकर व्याडि और इन्द्रदत्त मुझे लेकर उस कौशाम्बी नगरी से शीघ्र चल पड़े॥७६॥ "इसके पश्चात् यथासमय हमलोग वर्ष गुरु के घर पहुँचे और उन्होंने भी मूर्तिमान् स्कन्द के प्रभाव के समान मुझ बाल हुए समझा॥७७॥ एक शुभ दिन को वर्ष उपाध्याय ने पवित्र भूमि में बैठकर और हमलोगों को आगे बैठाकर दिव्य वाणी में ओंकार का उच्चारण किया॥७८॥ ओंकार का उच्चारण करते ही कार्तिकेय की कृपा से सांगोपांग वेद उपस्थित हो गये और तब उपाध्याय हम लोगों को पढ़ाने को उद्यत हुए॥७९॥ गुरु का एक बार कहने से उसे मैं स्मरण कर लेता था दूसरी बार के कहने पर व्याडि और तीसरी बार के कहने पर इन्द्रदत्त ग्रहण करते थे॥८०॥ अध्ययन प्रारम्भ होने पर, वर्ष के मुख से निकलती हुई उस अपूर्व दिव्य ध्वनि को सुनकर फिर 'यह क्या है' इस प्रकार आश्चर्य के साथ वर्ष उपाध्याय के घर पर चारों ओर से आकर एकत्र एवं स्तुति करते हुए ब्राह्मणगण प्रणामों से उनकी अर्चना करने लगे॥८१॥
२४ कथासरित्सागर
२४ कथासरित्सागर किमपि तदवलोक्य तत्र चित्रं प्रमदवशान्न परं तषोपवर्षं । अपि विततमहोत्सवं समग्रं समजनि पाटलिपुत्रपौरलोकः ॥८२॥ राजापि स गिरिशसूनुवरप्रभाव- मालोक्य तस्य परितोषमुपेत्य नन्दः । वर्षस्य वेश्म वसुभिः स किरादरेण सत्कारमेव समपूरयदुन्नतधीः ॥८३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके द्वितीयस्तरङ्गः ।
तृतीयस्तरङ्गः एवमुक्त्वा वररुचिं शृण्वत्येकाग्रमानसे । काणभूती वने तत्र पुनरेवेदमब्रवीत् ॥१॥ कदाचिदति कालस्य कृते स्वाध्यायकर्मणि । इति वर्षं उपाध्यायः पृष्ठोऽस्माभिः कृताह्निकः ॥२॥ इदमेवविधं कस्माद्भरं क्षेभतां गतम् । सरस्वत्याश्च लक्ष्म्याश्च तदुपाध्याय ! कथ्यताम् ॥३॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीदस्माञ्छृणु चैतत्कथामिमाम् । तीर्थं कनखलं^१ नाम गङ्गाद्वार^२स्ति पावनम् ॥४॥ मत्र काञ्चनपातन जाह्नवी देवदन्तिना । उशीनरगिरिग्रन्थाद् भित्वा समवतारिता ॥५॥ दाक्षिणात्यो द्विजः कश्चित्तपस्यन्भार्यया सह । तत्रासीत्तस्य चान्वेव जायन्ते स्म त्रयः सुताः ॥६॥ कालेन स्वर्गते तस्मिन् समाये च च तत्सुताः । स्थानं राजगृहं^३ नाम जग्मुर्विद्याजनेच्छया ॥७॥
१ हरद्वारसमीपे कनखलं तीर्थ प्रसिद्धं यत्र दक्षप्रजापतिना यज्ञोऽनुष्ठित इति ख्यातम् । २ गङ्गाद्वारमिदानीं हरद्वारेति प्रसिद्धम् । ३ राजगृहं साम्प्रतं बिहारप्रान्ते 'राजगिर' नाम्ना प्रसिद्धं स्थानमस्ति ।
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२६ कथासरित्सागर
२६ कथासरित्सागर तत्र चाधीतविद्यास्ते प्रयोऽप्याशाम्बुधौ सिता । ययु स्वामिकुमारस्य दर्शने दक्षिणापथम् ॥८॥ तत्र ते चिञ्चिनीं नाम नगरीमम्बुधेस्तटे । गत्वा भोजिकसञ्ज्ञस्य विप्रस्य न्यवसन्गृहे ॥९॥ स च कन्या निजास्तिस्रस्तेभ्यो दत्त्वा धनानि च । तपसेऽन्यसन्तानो गङ्गा याति स्म भोजिकः ॥१० ॥ अथ तेषां निवसतां तत्र श्वशुरवेश्मनि । अवग्रहकृतस्तीव्रो दुर्भिक्ष समजायत ॥११॥ तेन भार्या परित्यज्य साध्वीस्तास्ते त्रयो ययुः । स्पृशन्ति न नृशंसानां हृदयं बन्धुबुद्धयः ॥१२॥ सतस्तु मध्यमा तासां सगर्भामूत्ततश्च ताः । भवनं यज्ञदत्तस्य पितृमित्रस्य शिश्रियुः ॥१३॥ तत्र तत्तूर्णिमार्भवन्त्यान्य क्लिष्टवृत्तयः । आपद्यपि सतीवृत्तं किं मुञ्चन्ति कुलस्त्रियः ॥१४॥ कालेन मध्यमा चात्र तासां पुत्रमसूत सा । अन्योन्यातिशयात्तस्मिन्स्नेहस्तासामबर्धत ॥१५॥ कदाचिद् व्योममार्गेण विहरन्तं महेश्वरम् । अङ्कस्था स्कन्दजननी तं दृष्ट्वा सद्यावदत् ॥१६॥ देव ! पश्य क्षिप्तांरस्मिन्नेवास्तिस्रोऽपि योषितः । यत्स्नेहा दधतमाशामेषोऽस्माञ्जीवयिष्यतीति ॥१७॥ तत्तथा कुरु येनायमेता बालोऽपि जीवयेत् । इत्युक्तः प्रियया देवो वरदः स जगाद ताम् ॥१८॥ अनुगृह्णाम्यमू पूर्वं सभार्थेणामुना भृतः । आराधितोऽस्मि तेनायं भोगाथै निर्मितो भुवि ॥१९॥ एतन्नाम्ना च सा याता पाटली नाम भूपतेः । महेन्द्रवर्मणः पुत्री भार्यास्यैव भविष्यति ॥२० ॥ इत्युक्त्वा स विभुः स्वप्ने साध्वीस्तिस्रो जगाद ताः । नाम्ना पुत्रक एवाय युष्माकं बालपुत्रकः ॥२१॥ मस्य सुप्तप्रबुद्धस्य शीर्षान्त च दिने दिने। सुवर्णलक्ष भविता राजा चायं भविष्यति ॥२२॥
प्रथम लम्बक २७
प्रथम लम्बक २७ वहाँ पर (राजगृह में) विद्योपार्जन करके वे तीनों अनाथ और दुःखी बालक स्वामी कार्तिक के दर्शन करने के लिए वहाँ से दक्षिण-देश को गये॥८॥ वे दक्षिण-देश में समुद्र-तट पर स्थित विन्जिनी नामक नगरी में पहुँचे और वहाँ मोजिक नामक ब्राह्मण के घर में निवास करने लगे ॥९॥ उस मोजिक ब्राह्मण के तीन कन्याओं के अतिरिक्त और कोई सन्तान न थी। अतः वह अपनी तीनों कन्याओं को तीनों ब्राह्मणों को दान कर और साथ ही अपना धन भी उन्हें देकर गंगाद्वार (हरद्वार) की ओर चला गया ॥१० ॥ कुछ काल के अनन्तर श्वशुर-गृह में रहते हुए उन तीनों ब्राह्मणों को वर्षाभाव के कारण होनेवाले भीषण अकाल का अनुभव करना पड़ा ॥११॥ अकाल की भीषणता से व्याकुल होकर वे तीनों ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नियों को छोड़कर भाग गये। क्रूर व्यक्तियों के हृदयों में बन्धुत्व की भावना स्पर्श भी नहीं करती ॥१२॥ उन तीनों में बिचली बहुत गर्भवती थी। अतः वे तीनों इस विपत्ति में अपने पिता के मित्र यज्ञदत्त के घर में शरण लेने चली गईं और वहाँ जाकर अपने अपने पतियों का ध्यान करती हुई कठिनाई से जीवन व्यतीत करने लगीं। कुलीन स्त्रियां विपत्ति में भी अपने सती-चरित्र का परित्याग नहीं करतीं ॥१३-१४॥ उस बिचली बहन ने समयानुसार पुत्र उत्पन्न किया और तीनों बहनें उस शिशु के प्रति एक दूसरी से अधिक स्नेह करने लगीं ॥१५॥ किसी समय आकाश में भ्रमण करते हुए शिवजी की गोद में बैठी हुई स्कन्दमाता (पार्वती) उस बालक को देखकर दयापूर्वक कहने लगीं ॥१६॥ 'देव देखिए ! इस बालक पर ये तीनों स्त्रियाँ समान रूप से स्नेह करती हैं और यह आशा करती हैं कि यह बड़ा होने पर हमलोगों का पालन-पोषण करेगा ॥१७॥ इसलिए भगवन् ! आप ऐसी कृपा करें कि यह बालक इन तीनों का जीवन-निर्वाह कर सके। पार्वती के इतना कहने पर करुणाली शिवजी ने कहा ॥१८॥ 'मैं तो इसे पहले ही अनुगृहीत कर चुका हूँ क्योंकि इसने पूर्वजन्म में पत्नी के साथ मेरी आराधना की थी। उसी का फल भोगने के लिए इसे संसार में यह जन्म दिया गया है ॥१९॥ पाटली नाम की इसकी पत्नी राजा महेन्द्रवर्मा की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई है। वही इसकी पत्नी बनेगी' ॥२० ॥ पार्वती से ऐसा कहकर शिवजी ने उन तीनों पतिव्रताओं से स्वप्न में कहा कि 'यह तुम्हारा शिशु नाम से भी पुत्रक ही रहेगा पुत्रक नाम से प्रसिद्ध होगा। यह जब सोकर उठेगा तब प्रतिदिन इसके सिरहाने में एक लाख स्वर्ण-मुद्रा मिला करेगी और आगे चलकर यह राजा होगा' ॥२१-२२॥
२८ कथासरित्सागर
२८ कथासरित्सागर ततः सुप्तोत्थिते तस्मिन्बाल वा प्राप्य काञ्चनम् ।। यज्ञदत्तसुता साध्यो ननन्दु फलितव्रता ॥२३॥ अथ तेन सुवर्णेन धृतकोपोऽचिरेण सः। बभूव पुत्रको राजा तपोऽधीना हि सम्पदः ॥२४॥ कदाचिद्यज्ञदत्तोऽथ रहः पुत्रकमब्रवीत्। राजन्कुभिक्षदोषेण क्वापि ते पितरो गताः ॥२५॥ तत्सदा देहि विप्रेभ्यो यतायान्ति निशम्य ते। ब्रह्मदत्तकथां चातो कथयामि च ते शृणु ॥२६॥ वाराणस्यामभूत्पूर्व ब्रह्मदत्ताभिधो नृपः। सोऽपश्यद्धंसयुगलं प्रयातं गगने निशि ॥२७॥ विस्फुरत्कनकच्छायं राजहंसशतैर्वृतम् । विद्युत्पुञ्जमिवाकाण्डसिताभ्रपरिवेष्टितम् ॥२८॥ पुनस्तद्दर्शनेात्कण्ठा तस्यास्य ववृधे ततः। यथा नृपतिसौख्येषु न बबन्ध रतिं क्वचित् ॥२९॥ मन्त्रिभिः सह संमन्त्र्य ततश्चाकारयत्सरः। स राजा स्वमते कान्तं प्राणिनां चाभयं ददौ ॥३०॥ ततः कालेन तौ प्राप्तौ हंसौ राजा ददर्श सः। विश्वस्तो चापि पप्रच्छ हैमे वपुषि कारणम् ॥३१॥ व्यक्तवाचौ ततस्तौ च हंसौ राजानमूचतुः। पुरा जन्मान्तरे काकावावां जातौ महीपते ॥३२॥ बल्यर्थ युध्यमानौ च पुण्ये शून्ये शिवालये विनिपत्य विपन्नौ स्वस्तत्स्थानद्रोणिकान्तरे ॥३३॥ जातौ जातिस्मरावावां हंसौ हेममयौ ततः। तच्छ्रुत्वा तौ यथाकामं पश्यन् राजा तुतोष सः ॥३४॥ अतोऽन्यव्यापृत्यादेव पितॄन्दानाववाप्स्यसि। इत्युक्तो यज्ञदत्तेन पुत्रकस्तत्तथाकरोत् ॥३५॥ श्रुत्वा प्रदानवार्तां तामाजग्मुस्ते द्विजातयः। परिज्ञाता परा लक्ष्मीं पत्नीदत्त सह रमिरे ॥३६॥ आश्चर्यमपरित्याज्यो दृष्टनष्टापनामपि। अविवेकाभ्युदीर्णा स्वात्नुभावो दुरात्मनाम् ॥३७॥
प्रथम लम्बक २९
प्रथम लम्बक २९ दूसरे दिन उस बालक के सोकर उठने पर, उसके सिरहाने में सुवर्ण पाकर मम्मट की पतिव्रता पुत्रियाँ अपने व्रत को सफल समझकर अत्यन्त आनन्दित हो उठीं ॥२३॥ इस प्रकार प्रतिदिन एकत्र होते हुए सोने से खजाना बढ़ जाने पर धीरे-धीरे पुत्रक राजा बन गया। सच है 'सिद्धियाँ तप के अधीन होती हैं' ॥२४॥ एक बार एकान्त में यज्ञदत्त ने पुत्रक से कहा—'हे राजन् ! तुम्हारे पितर दुर्भिक्ष के कारण यहाँ से कहीं चले गये हैं। इसलिए तुम ब्राह्मणों को सदा दान दिया करो। वे भी तुम्हारी उदारता सुनकर आ जायेंगे। मैं इस विषय में ब्रह्मदत्त राजा की एक कथा सुनाता हूँ, सुनो' ॥२५ २६॥ राजा ब्रह्मदत्त की कथा प्राचीन समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त नाम का राजा था। उसने एक बार रात्रि के समय आकाश में उड़ते हुए हंसों की जोड़ी को देखा जिसके चारों ओर बिजली के समान चमकती हुई, सोने के पंखों की प्रभा छिटक रही थी। उसके चारों ओर श्वेत हंस ऐसे उड़ रहे थे जैसे आकाश में ही श्वेत मेघ-खण्डों से व्याप्त विद्युत्पुंज हों ॥२७-२८॥ उस हंस-युगल को देखने की राजा की लालसा ऐसी तीव्र हुई कि वह राज्य के सुखों से भी विरक्त रहने लगा ॥२९॥ तब राजा ने मन्त्रियों के साथ सम्मति करके एक सुन्दर सरोवर बनवाया और अपने राज्य में समस्त प्राणियों को अभयदान दिया ॥३०॥ कुछ समय के पश्चात् वे हंस पुनः उस सरोवर पर आये और उनके विश्वस्त होने पर राजा ने उनके स्वर्ण के शरीर होने का कारण पूछा ॥३१॥ तब वे हंस स्पष्ट वाणी में राजा से बोले—'हे राजन् ! पहले जन्म में हम कौए थे ॥३२॥ बलि (भोजन) के लिए लड़ते हुए हम दोनों एक शून्य और पवित्र शिवालय में गये और वहाँ जाकर जल की टंकी में गिरे और मर गये ॥३३॥ इसी कारण इस जन्म में हमलोग सुवर्णमय हंस हुए। राजा इस प्रकार सुनकर और जी भरकर उन्हें देखकर प्रसन्न हुआ ॥३४॥ अतः तुम भी असाधारण रूप से दान करते हुए अपने पितरों को प्राप्त करोगे। ऐसा सुनकर पुत्रक ने असाधारण रूप से दान करके ख्याति प्राप्त की ॥३५॥ इस प्रकार पुत्रक के दान की ख्याति सुनकर वे ब्राह्मण यहाँ आये और पहचाने जाने पर अतुल सम्पत्ति और अपनी पत्नियों को प्राप्त कर सुखी हुए ॥३६॥ यह आश्चर्य है कि मदिरा से अन्ध बुद्धिवाले दुष्ट जातियों का ज्ञान और नष्ट होते देखकर भी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते ॥३७॥
३ कथासरित्सागर
३ कथासरित्सागर कारून राज्यकामास्त पुत्रक तं जिघांसव । निन्युस्तद्दर्शनव्याजाद्द्विजा विन्ध्यनिवासिनीम् ॥३८॥ वधकान्स्थापयित्वा च देवी गर्भगृहान्तरे । तमूचु पूर्वमकरस्व पश्च देवी प्रजान्तरम् ॥३९॥ तत प्रविष्टो विश्वासात्स दृष्ट्वा हन्तुमुद्यतान् । पुश्यान् पुत्रकोऽपृच्छत्कस्माद्भिहथ मामिति ॥४०॥ पितृभिस्ते प्रयुक्ता स्म स्वप्न दत्वेति चाब्रुवन् । ततस्तान्मोहिताञ्छ्वेभ्या बुद्धिमान्पुत्रकोऽवदत् ॥४१॥ ददाम्यतद्धनं वो रत्नालङ्करण निजम् । मां मुञ्चत करोम्यत्र नोद्भेद यामि दूरत ॥४२॥ एवमस्त्विति तत्तस्माद्गृहीत्वा वधका गता । 'हृत पुत्रक' इत्युचुस्तत्पितृणापुरो मृषा ॥४३॥ तत प्रतिनिवृत्तास्ते हृता राज्यार्थिनो द्विजा । मन्त्रिभिर्द्रोहिणो बुद्ध्य कृतघ्नाना शिव कुत ॥४४॥ अत्रान्तर स राजापि पुत्रक सत्यसङ्गर । विवेश विन्ध्यकान्तार विरक्त स्वेषु बन्धुषु ॥४५॥ भ्रमन्ददर्श सत्रासौ बाहुयुद्धैकतत्परौ । पुरुषा द्वौ ततस्तौ स पृष्टवान्को युवामिति ॥४६॥ मयासुरसुतावावां तदीय चास्ति नौ धनम् । इद भाजनमया च यष्टिरेते च पादुके ॥४७॥ एतन्निमित्त युद्ध नौ यो बली स हरेदिति । एतत्तद्वचनं श्रुत्वा हसन् प्रोवाच पुत्रक ॥४८॥ कियदेतद्धनं पुंस्तस्ततस्तौ समवोचताम् । पादुके परिधायैते खेचरत्वमवाप्यते ॥४९॥ यद्यत्त्या यल्लिख्यते किञ्चित्सत्य सम्पद्यत हि तत् । भाजने यो य आहारश्चिन्त्यते स स तिष्ठति ॥५०॥ तच्छ्रुत्वा पुत्रकोऽवादीत्कि युद्धेनान्स्वयं पण । धावन्त्यणाधिको य स्यात्स एवैतद्धरेदिति ॥५१॥
प्रथम लम्बक ३१
प्रथम लम्बक ३१ कुछ समय आनन्द का उपभोग करते हुए भी वे ब्राह्मण पुत्रक को मारकर उसका राज्य हड़पने की इच्छा से उसे विन्ध्यवासिनी के दर्शन के बहाने वहाँ ले गये ॥३८॥ वहाँ पर देवी के मन्दिर के भीतरी भाग में वध करनेवालों को रखकर उन्होंने पुत्रक से कहा कि 'पहले तुम अकेले ही देवी के दर्शन करो। भीतर जाओ' ॥३९॥ उनके विश्वास पर मन्दिर के अन्दर प्रवेश करते ही पुत्रक ने प्रहार के लिए उद्यत वधिकों को देखकर पूछा कि 'तुमलोग मुझे क्यों मारते हो ? ॥४०॥ उन्होंने कहा कि तुम्हारे पितरों ने सोना देकर हमें मारने के लिए प्रेरित किया है'। भगवती की कृपा से भ्रष्ट बुद्धिवाले उन वधिकों से पुत्रक ने कहा॥४१॥ मैं तुम्हें अपने बहुमूल्य जवाहिरातों के आभूषण देता हूँ। तुमलोग मुझे छोड़ दो मैं यह बात किसी से न कहूँगा और दूर चला जाता हूँ'॥४२॥ ऐसा कहने पर वधिक लोभ उसे छोड़कर चले गये और उसके पितरों से जाकर झूठ कह दिया कि पुत्रक को मार दिया ॥४३॥ इस प्रकार पाप-कर्म करके राज्य पाने की इच्छावाले ब्राह्मण लौटकर घर गये तो उन्हें राजद्रोही समझकर पुत्रक के मन्त्रियों ने मार डाला। भला ! कृतघ्नों का कल्याण किस प्रकार हो सकता है॥४४॥ इसी बीच राजा पुत्रक भी अपने सम्बन्धियों से विरक्त होकर विन्ध्याचल के गहन वन में चला गया ॥४५॥ वन में घूमते हुए उसने दो असुर-युवकों को बाहुयुद्ध के लिए तैयार खड़े देखा और उनसे पूछा कि 'तुम दोनों कौन हो ? ॥४६॥ वे कहने लगे—'हम दोनों मयासुर के लड़के हैं। हमारे पास यह पैतृक धन है—एक पात्र एक लाठी और दो खड़ाऊँ' ॥४७॥ इस पैतृक धन के लिए हमलोगों का युद्ध हो रहा है 'कि जो बलवान् हो वह इसे प्राप्त करे। उनकी इन बातों को सुनकर पुत्रक ने हँसकर कहा ॥४८॥ 'पुरुष के लिए यह कितना धन है, जिसके लिए तुमलोग युद्ध कर रहे हो। तब वे दोनों बोले—'इस खड़ाऊँ को पहनने से मनुष्य आकाशचारी हो जाता है ॥४९॥ छड़ी से जो कुछ भी लिखा जाता है वह सत्य होता है और इस पात्र में जिस भोजन का ध्यान करें, वही भोजन रखा हुआ मिलता है' ॥५०॥ यह सुनकर पुत्रक ने कहा—'इन वस्तुओं के लिए युद्ध की शर्त उचित नहीं है। दौड़ने में जो अधिक बलवान् हो वही इन्हें ले ले' ॥५१॥ १ इस कथा से मिलती-जुलती कहानी 'अरेबियन नाइट्स' में है, जिसमें शाहजादा मुहम्मद और परीबानू की कहानी में ऐसा प्रसंग आता है कि तीन शहजादे, नूर निहार से शादी करने के लिए ऐसी ही तीन चीजें लाये थे उसका फैसला करने के लिए तीर फेंके गये थे।
३२ कथासरित्सागर
३२ कथासरित्सागर एवमस्त्विति तौ मूढौ धावितौ सोऽपि पादुके । अध्यास्योत्पपतद् व्योम गृहीत्वा यष्टिभाजने ॥५२॥ अथ दूरं क्षणाद् गत्वा ददर्श नगरीं शुभाम् । अकणिकाख्यां तस्यां च नभसोऽवततार सः ॥५३॥ वञ्चनप्रवणा वेश्या द्विजा मत्सिरो यथा । वणिजो धनलुब्धाश्च कस्य गेहे वसाम्यहम् ॥५४॥ इति सञ्चिन्तयन्नाप स राजा विजनं गृहम् । जीर्णं तदन्तरे चैकां वृद्धां योषितमैक्षत ॥५५॥ प्रदानपूर्वं सन्तोष्य यां वृद्धामावृत्तस्तथा । उवासासन्शितस्तत्र पुत्रक शीलसन्धनि ॥५६॥ कदाचित्साच सम्प्रीता वृद्धा पुत्रकमब्रवीत् । चिन्ता मे पुत्र ! यद्भार्या नानुरूपा तव क्वचित् ॥५७॥ इह राज्ञस्तु तनया पाटलीत्यस्ति कन्यका । उपयन्तःपुरे सा च रत्नमित्यभिरक्ष्यते ॥५८॥ एतद्वृद्धावचस्तस्य दत्तकर्णस्य शृण्वतः । विवेश तेनव पथा हृन्मदन्धो हृदि स्मरः ॥५९॥ द्रष्टव्या सा मयाद्यैव कान्तेति कृतनिश्चयः । निशीथे नभसा तत्र पादुकाभ्यां जगाम सः ॥६०॥ प्रविश्य सोऽत्रि शृङ्गाग्र-शुङ्ग-वातायनेन ताम् । अन्तःपुरे ददर्शाथ सुप्तां रहसि पाटलीम् ॥६१॥ सेव्यमानामविरतं चन्द्रकान्त्याङ्गरुक्नया । जित्वा जगद्वि धास्तां मूर्ता शक्ति मनोभुवः ॥६२॥ कथं प्रबोधयाम्येतामिति यावद्व्यचिन्तयत् । इत्यकस्माद् बहिस्तावद्यामिकः पुरुषो जगौ ॥६३॥ आलिङ्ग्य मधुकरहुतिमलमामियदीक्षण रहः कान्ताम् । यद्बोधयन्ति सुप्तां जन्मनि यूनां तदेव फलम् ॥६४॥ श्रुत्ववत्तदुपादपातम् दुरम्वम्यविक्यवे । मलिंग्निह गता कान्तो प्राबुध्यत ततश्च सा ॥६५॥
प्रथम लम्बक ३३
प्रथम लम्बक ३३ 'यही ठीक है' ऐसा कहकर वे दोनों मूर्ख अमूढ़-मुख दीख पड़े और युवक उस छड़ी एवं पात्र को लेकर खड़ाऊँ पहनकर आकाश में उड़ गया और वे दोनों मूर्ख बन गये'।।५२।। खड़ाऊँ के प्रभाव से क्षण भर में ही लम्बी यात्रा करके युवक ने आरम्भिका नाम की सुन्दर नगरी देखी और आकाश से उतर गया ।।५३।। उतरकर उसने सोचा—'संध्याके ढलने में अभी देरी है। ब्राह्मण मेरे विषय के समान विश्रामशाला और साथी हैं, बनिये धन के साथी होते हैं। अतः मैं विप्रके घर पर निवास करूँ' ।।५४।। ऐसा सोचते-सोचते राजा ने एक एकान्त, पुरातन और टूट-फूट मकान तथा उसके भीतर जाकर एक वृद्धा स्त्री को देखा।।५५।। उसने उस बूढ़ी स्त्री को कुछ धन देकर सन्तुष्ट किया और उस वृद्धा के आदर-सत्कार करने पर वह उसी मकान में ठहरकर रहने लगा।।५६।। किसी समय प्रसन्न होकर उस वृद्धा ने कहा—'पुत्र! सब कुछ यहाँ ही मिलता है कि तुम्हारा अनुभव कहीं कभी भारी नहीं है ।।५७।। लेकिन उस राज्य के राजा की पाटली नामक कन्या है। उस अन्तःपुर के ऊपर गरुड़ के समान मूर्त्त रूप रखा गया है ।।५८।। वृद्धा के वचनों का आदर करते हुए युवक के हृदय में उसी (कन्या के) रूप ने काम का बाण प्रहार किया ।।५९।। 'उस कन्या को मैं आज ही हरूँगा'—ऐसा निश्चय करके युवक ने उस खड़ाऊँ को पहन कर आकाश-मार्ग से उसके पास पहुँच गया ।।६० ॥ पर्वत की चोटी के समान ऊँचे मन्दिर की खिड़की में प्रवेश कर उसने एकान्त में सोई हुई पाटली को देखा ।।६१।। शय्या पर निश्चेष्ट पड़ी हुई उस स्त्री के प्रभाव से वह रात्रि इस प्रकार सुवासित हो रही थी, मानो समस्त संसार को जीतकर आकर विश्राम करती हुई कामदेव की रतिमूर्ती रुचिर हो ।।६२।। 'इसे कैसे जगाऊँ'—यह सोचकर युवक साथ ही रत्न पाकर उसी कन्या के कमर के वस्त्र से परस्पर से बाँध दी।।६३।। मयूर हुंकार करती हुई और उत्तरीय वस्त्र में उलझ कर अपनी आँकवाली प्रमदा को आलिंगन कर उसे जगाता ही, वयंका के जगाने की व्यवस्था है ।।६४।। इस प्रक्रिया को समझकर कुछ काँपती हुई आँख से युवक ने पाटली का आलिंगन किया और वह जाग उठी।।६५।।
१ इसी प्रकार की कथा, हरिवंशकालीन कथाके समान और डैंग्लर के फेयरीटेल्स में आती है। उसमें कुछ परिवर्तन अवश्य किया गया है।
१४ कथासरित्सागर
१४ कथासरित्सागर पश्यन्त्यास्त नृप तस्या लज्जाकौतुकयोर्हृशि । अभूदन्योन्यसमर्दौ रचयन्त्या गतागतम् ॥६६॥ अथालाप इव वृत्ते गान्धर्वाद्विवाहकर्मणि । अवर्धत तया प्रीतिर्दम्पत्योर्न तु यामिनी ॥६७॥ आमन्त्राम बभूवुर्त्का तद्गतेनैव चेतसा । आययो पश्चिमं भागं तद्वृद्धावेश्म पुत्रकः ॥६८॥ इत्थं प्रतिनिशं तत्र कुर्वाणेऽस्मिन्गतागतम् । सम्भोगचिह्नं पाटल्या रक्षिभिर्दृष्टमेकदा ॥६९॥ तैस्तदावेदितं तस्या पितु सोऽपि नियुक्तवान् । गूढमन्तःपुरे तत्र निशि नारीमवेक्षितुम् ॥७०॥ तया च तस्य प्राप्तस्य तत्राभिज्ञानसिद्धये । पुत्रकस्य प्रसुप्तस्य न्यस्तं वासस्यलक्तकम् ॥७१॥ प्रातस्तया च विज्ञातो राजा चारान्व्यसर्जयत् । सोऽभिज्ञानाच्च तै प्राप्त पुत्रको जीर्णवेश्मनि ॥७२॥ आनीतो राजनिट कुपितं वीक्ष्य च नृपम् । पादुकाभ्यां समुत्पत्य पाटलीमंदिरेऽविशत् ॥७३॥ विदिता स्वस्तनुत्तिष्ठ गच्छाव पादुकाबलात् । इत्यङ्के पाटलीं कृत्वा अगाम नभसा ततः ॥७४॥ अथ गङ्गातटनिकट गगनादवतीर्य स प्रियन्ताम् । पात्रप्रभावजाताहारैरनन्दयामास ॥७५॥ आसोक्तित्प्रभाव पाटल्या पुत्रकोऽपिसह ततः । यष्ट्या लिखित तत्र स नगर चतुरङ्गवलयुक्तम् ॥७६॥ तत्र स राजा भूत्वा महाप्रभाव च सत्यतां प्राप्ते । नमयित्वा त दनृपुर शशास पृथ्वीं समुद्रासाम् ॥७७॥ तदिव दिव्य नगर माययारचित सपौरमत एव । नाम्ना पाटलिपुत्र छात्र लक्ष्मीसरस्वत्यो ॥७८॥ इति वर्षमुखादिमामपूर्वां वयमाकर्ण्य कथामतीव चित्राम् । चिरमासमभूम बाणभूत विलसद्विस्मयमोदमानचित्ता ॥७९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे प्रथमे कथापीठलम्बके तृतीयस्तरङ्गः ।
प्रथम लम्बक ३५
प्रथम लम्बक ३५ उस राजा पुत्रक को देखकर पाटली की आँखों में लज्जा और आश्चर्य का संयम होने लगा। परपुरुष को देखकर लज्जा और उसका ऐसे अवसर पर वहाँ उपस्थित होना आश्चर्य का कारण था ॥६६॥ इसके अनन्तर वार्तालाप और गन्धर्व-विवाह हो जाने पर दोनों में परस्पर प्रीति बढ़न लगी किन्तु रात यही बड़ी अर्थात् रात समाप्त हो गई ॥६७॥ रात्रि के अन्तिम प्रहर में वह राजा पुत्रक उत्कण्ठित वधू (पाटली) से कहकर तल्लीन भाव से उस वृद्धा के पुराने घर पर लौट आया ॥६८॥ इस प्रकार पुत्रक प्रत्येक रात्रि में पाटली के यहाँ यातायात करता रहा। किन्तु एक बार पाटली के रक्षकों ने उसके सम्भोग-चिह्नों को देख लिया ॥६९॥ रक्षकों (पहरेदारों) ने सारी परिस्थिति राजा से बता दी। राजा ने पाटली के भवन में रात्रि को देखने के लिए एक स्त्री-जासूस को नियुक्त कर दिया ॥७०॥ इस प्रकार एक दिन उस गुप्त स्त्री ने पहचान के लिए, सोये हुए पुत्रक के वस्त्र में पाटली की महावर लगा दी ॥७१॥ प्रातःकाल उस जासूस स्त्री ने राजा को बताया और राजा ने भी अपने दूतों को उसे पकड़ने के लिए भेज दिया। दूतों ने उस पुराने घर में महावर लगे कपड़े के गुण से उसकी पहचान करके वृद्धा के घर पर पुत्रक को पकड़ लिया ॥७२॥ दूत पुत्रक को पकड़कर उसे राजा के पास ले आये। किन्तु पुत्रक ने जब राजा को क्रुद्ध होते हुए देखा तब खड़ाऊँ के प्रभाव से वह आकाश-मार्ग से पाटली के घर में पहुँच गया ॥७३॥ उसने पाटली से कहा- हमलोग पकड़ गये। तुम उठो, खड़ाऊँ के प्रभाव से निकल भागते हैं। ऐसा कहकर और पाटली को गोद में उठाकर पुत्रक आकाश-मार्ग से निकल गया ॥७४॥ तदनन्तर गंगातट के समीप आकाश-मार्ग से उतरकर पुत्रक ने थकी हुई पाटली को उस पात्र के प्रभाव से मिलनेवाले विविध भोजन से प्रसन्न किया ॥७५॥ पाटली ने पुत्रक के प्रभाव को देखकर प्रार्थना की और उसके प्रार्थनानुसार पुत्रक ने उस छड़ी से चतुरंगिणी सेना-सहित जमीन पर एक नगर का नक्शा बनाया ॥७६॥ छड़ी से लिखे गये और सचमुच बने हुए उस प्रभावशाली नगर में वह पुत्रक राजा बनकर बैठा और अपने प्रभाव से श्वशुर (पाटली के पिता) को वश में करके समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का शासक बन गया ॥७७॥ इस प्रकार यह दिव्य नगर पुरस्वामियों-सहित माया से रचा गया जो पाटलिपुत्र नाम से लक्ष्मी और सरस्वती का क्षेत्र हुआ" ॥७८॥ वररुचि ने कहा- हे काणभूते इस प्रकार उपाध्याय वर्ष के मुख से यह अपूर्व और विचित्र कथा सुनकर हम सब आश्चर्य में आनन्दित हुए ॥७९॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के प्रथम लम्बक का तृतीय तरङ्ग समाप्त।
३६ कथासरित्सागर
३६ कथासरित्सागर चतुर्थस्तरङ्गः इत्याख्याय कथां मह्यं विन्ध्यान्तं श्वोऽभिभूतये । पुनर्वररुचिस्तस्मै प्रकृतार्थमवर्णयत् ॥१॥ एवं व्याडीन्द्रदत्ताभ्यां सह तत्र वसन् क्रमात् । प्राप्तोऽहं सर्वविद्यानां पारमुत्क्रान्तशैशवः ॥२॥ इन्द्रोत्सवं कदाचिच्च प्रेक्षितुं निर्गता वयम् । कन्यामेकामपश्याम कामस्यास्त्रमसायकम् ॥३॥ इन्द्रदत्तो मया पृष्टस्तत् केयं भवेदिति । उपवर्षसुता सेयमुपकोशेति सोऽब्रवीत् ॥४॥ सा सखीभिश्च मां ज्ञात्वा प्रीतिपक्ष्मलया दृशा । स्नपन्ती मन्मथच्छेवाद्यगच्छद् भवनं निजम् ॥५॥ पूर्णचन्द्रमुखी नीलनीरोजमलोचना । मृणालनालललितभुजा पीनस्तनोज्ज्वला ॥६॥ कम्बुकण्ठी प्रवालप्रभरदनच्छदशोभिनी । स्मरभूपतिसौन्दर्यमन्दिरेवेन्दिरापरा ॥७॥ ततः कामशरापातनिर्भिन्ने हृदये न मे । निशि तस्यामभून्निद्रा तद्विम्बोष्ठपिपासया ॥८॥ कथञ्चिल्लब्धनिद्रोऽहमपश्यं रजनीक्षये । शुक्लाम्बरधरां दिव्यां स्त्रियं सा मामभाषत ॥९॥ पूर्वभार्योपकोशा ते गुणज्ञा नापरं पतिम् । कञ्चिदिच्छत्यतश्चिन्ता पुत्र ! कार्या न त्वया ॥१०॥ अहं सदा शरीरान्तर्वासिनी ते सरस्वती । त्वद्दुःखं नोत्सहे द्रष्टुमित्युक्त्वान्तर्हिताऽभवत् ॥११॥ ततः प्रबुद्धो ज्ञातास्थो गत्वाऽप्रतिष्ठमहं शनैः । दयिता-मन्दिरासन्न-वालभूत-तरोरधः ॥१२॥ अथागत्य समाख्यातस्तत्सख्या मन्निवन्धनम् । उद्गाढमुपकोशाया नवानङ्गजविजृम्भितम् ॥१३॥ ततोऽहं द्विगुणीभूततापस्तामवमब्रुवम् । अवलां गुरुभिः स्वच्छन्दमुपकोशां कथं भजे ॥१४॥
प्रथम लम्बक १७
प्रथम लम्बक १७ चतुर्थ तरंग उपकोशा की कथा विन्ध्याटव्य में इस प्रकार वररुचि ने काणभूति को कथा सुनाकर पुनः प्रासंगिक विषय का वर्णन प्रारम्भ किया ॥१॥ इसी क्रम से व्याडि और इन्द्रदत्त के साथ पाटलिपुत्र में रहते हुए बाल्यावस्था के समाप्त होते-होते मैं समस्त विद्याओं का पारगामी पण्डित हो गया ॥२॥ एक बार इन्द्रोत्सव देखने के लिए हम लोग नगर में निकले तो वहाँ हम लोगों ने एक कन्या देखी जो मानों कामदेव के सायक (बाण) विहीन अस्त्र (धनुष) के समान थी ॥३॥ उसे देखकर मैंने अपने सहपाठी इन्द्रदत्त से पूछा कि 'यह कौन होगी ?' उत्तर में उसने मुझसे कहा कि 'उपवर्ष की कन्या उपकोशा है' ॥४॥ उसने भी अपनी सखियों से मेरा परिचय प्राप्त किया और प्रेमपूर्ण दृष्टि से मेरे मन को खींचती हुई किसी तरह अपने घर को चली गई ॥५॥ उस उपकोशा का मुख पूर्णचन्द्र के समान कान्त और आकर्षक था। आँखें नील-कमल के समान सुन्दर थीं। भुजाएँ, कमलनाल के समान कोमल तथा सुन्दर थीं और पीन स्तनों से वह अधिक आकर्षक हो रही थी ॥६॥ उसका गला शंख के समान था और प्रवाल या मूँगे के समान रक्ताभ ओठों से उसकी शोभा और बढ़ रही थी। इस प्रकार वह मानो काम-रूपी महीपति के सौन्दर्य-मन्दिर की दूसरी गृह-लक्ष्मी के समान थी ॥७॥ उसके देखने के अनन्तर काम-बाण से मेरे हृदय के बिंध जाने से अतएव उसके बिम्बाधरों की पिपासा के कारण व्याकुल मुझे उस रात को नींद नहीं आई ॥८॥ किसी प्रकार रात्रि के व्यतीत होने पर प्रातःकाल मुझे निद्रा आई। उस समय स्वप्न में श्वेतवस्त्रधारिणी किसी दिव्य स्त्री ने मुझसे कहा ॥९॥ 'उपकोशा तुम्हारी पूर्वजन्म की पत्नी है। वह तुम्हारे गुणों पर अनुरक्त है और वह दूसरे को पति नहीं बनाना चाहती। इसलिए हे पुत्र ! तुम उसकी चिन्ता न करो ॥१०॥ 'मैं तुम्हारे शरीर के अन्दर सदा रहनेवाली सरस्वती हूँ इसलिए मैं तुम्हारा कष्ट नहीं देख सकती'। इतना कहकर वह अन्तर्हित हो गई ॥११॥ प्रातःकाल जगकर मैं विश्वस्त हो गया और धीरे-धीरे उपकोशा के मकान के समीप आम के एक वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गया ॥१२॥ कुछ समय के पश्चात् उपकोशा की सखी ने आकर उसकी गम्भीर काम-पीडा की मुझे सूचना दी ॥१३॥ उसकी अवस्था को जानकर, कुछ सन्तप्त होकर मैंने उसकी सखी से कहा—'गुरुजनों के दान के बिना मैं उपकोशा को स्वच्छन्दतापूर्वक कैसे ग्रहण कर सकता हूँ ? ॥१४॥
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर वरं हि मृत्युर्नाकीर्तिस्त्वत्सखीहृदयं तव। गुरुर्भियादि बुध्येत तत्कदाचिच्छिवं भवेत् ॥१५॥ तदतत्कुरु भद्रे ! त्वं तां सखीं मां च जीवय। तच्छ्रुत्वा सा गता सख्या मातुः सर्वं न्यवेदयत् ॥१६॥ तया तत्कथितं भर्तुरुपवर्षस्य तत्क्षणम्। यज्ञे भ्रातुश्च वर्षस्य तेन तच्चाभिनन्दितम् ॥१७॥ विवाहं निश्चितं गत्वा व्याडिरानयति स्म ताम्। वर्षात्तानिनिवेशनं सोपाम्ब्या जननीं मम ॥१८॥ अथोपकोशा विधिवत्पित्रा मे प्रतिपादिता। तया मात्रा गृहिण्या च समं तत्रावसं सुखम् ॥१९॥ अथ कालेन वर्षस्य शिष्यवर्गो महानभूत्। तत्रैकः पाणिनिर्नाम' जडबुद्धितरोऽभवत् ॥२०॥ स शुश्रूषापरिक्लिष्टः प्रेषितो वर्षभार्यया। अगच्छत्तपसे खिन्नो विद्याकामो हिमालयम् ॥२१॥ तत्र तीव्रेण तपसा तोषितादिन्दुशेखरात्। सर्वविद्यामुखं तेन प्राप्तं व्याकरणं नवम् ॥२२॥ ततश्चागत्य मामत्र वादायाह्वयते स्म सः। प्रवृत्ते चावयोर्वादे प्रयाताः सप्त वासराः ॥२३॥ अष्टमेऽह्नि मया तस्मिञ्जिते तत्समनन्तरम्। नभस्थेन महाघोरो हुङ्कारः शम्भुना कृतः ॥२४॥ तेन प्रणष्टमस्मद् ... तस्मद्व्याकरणं भुवि। जिताः पाणिनिना सर्वे मूर्खीभूता वयं पुनः ॥२५॥ अथ सञ्जातनिर्वेदः स्वगृहस्थितये धनम्। हस्ते हिरण्यगुप्तस्य विधाय वणिजो निजम् ॥२६॥ उक्त्या सर्वोपरोगाय गन्तवानस्मि शङ्करम्। तपोभिराराधयितुं निराहारो हिमालयम् ॥२७॥ १ अत्रामान्त्रितमपडेवेकवर्षम् । २यदविवरणं परिशिष्टे विहारीकृतम् ।