कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक १७ चतुर्थ तरंग उपकोशा की कथा विन्ध्याटव्य में इस प्रकार वररुचि ने काणभूति को कथा सुनाकर पुनः प्रासंगिक विषय का वर्णन प्रारम्भ किया ॥१॥ इसी क्रम से व्याडि और इन्द्रदत्त के साथ पाटलिपुत्र में रहते हुए बाल्यावस्था के समाप्त होते-होते मैं समस्त विद्याओं का पारगामी पण्डित हो गया ॥२॥ एक बार इन्द्रोत्सव देखने के लिए हम लोग नगर में निकले तो वहाँ हम लोगों ने एक कन्या देखी जो मानों कामदेव के सायक (बाण) विहीन अस्त्र (धनुष) के समान थी ॥३॥ उसे देखकर मैंने अपने सहपाठी इन्द्रदत्त से पूछा कि 'यह कौन होगी ?' उत्तर में उसने मुझसे कहा कि 'उपवर्ष की कन्या उपकोशा है' ॥४॥ उसने भी अपनी सखियों से मेरा परिचय प्राप्त किया और प्रेमपूर्ण दृष्टि से मेरे मन को खींचती हुई किसी तरह अपने घर को चली गई ॥५॥ उस उपकोशा का मुख पूर्णचन्द्र के समान कान्त और आकर्षक था। आँखें नील-कमल के समान सुन्दर थीं। भुजाएँ, कमलनाल के समान कोमल तथा सुन्दर थीं और पीन स्तनों से वह अधिक आकर्षक हो रही थी ॥६॥ उसका गला शंख के समान था और प्रवाल या मूँगे के समान रक्ताभ ओठों से उसकी शोभा और बढ़ रही थी। इस प्रकार वह मानो काम-रूपी महीपति के सौन्दर्य-मन्दिर की दूसरी गृह-लक्ष्मी के समान थी ॥७॥ उसके देखने के अनन्तर काम-बाण से मेरे हृदय के बिंध जाने से अतएव उसके बिम्बाधरों की पिपासा के कारण व्याकुल मुझे उस रात को नींद नहीं आई ॥८॥ किसी प्रकार रात्रि के व्यतीत होने पर प्रातःकाल मुझे निद्रा आई। उस समय स्वप्न में श्वेतवस्त्रधारिणी किसी दिव्य स्त्री ने मुझसे कहा ॥९॥ 'उपकोशा तुम्हारी पूर्वजन्म की पत्नी है। वह तुम्हारे गुणों पर अनुरक्त है और वह दूसरे को पति नहीं बनाना चाहती। इसलिए हे पुत्र ! तुम उसकी चिन्ता न करो ॥१०॥ 'मैं तुम्हारे शरीर के अन्दर सदा रहनेवाली सरस्वती हूँ इसलिए मैं तुम्हारा कष्ट नहीं देख सकती'। इतना कहकर वह अन्तर्हित हो गई ॥११॥ प्रातःकाल जगकर मैं विश्वस्त हो गया और धीरे-धीरे उपकोशा के मकान के समीप आम के एक वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गया ॥१२॥ कुछ समय के पश्चात् उपकोशा की सखी ने आकर उसकी गम्भीर काम-पीडा की मुझे सूचना दी ॥१३॥ उसकी अवस्था को जानकर, कुछ सन्तप्त होकर मैंने उसकी सखी से कहा—'गुरुजनों के दान के बिना मैं उपकोशा को स्वच्छन्दतापूर्वक कैसे ग्रहण कर सकता हूँ ? ॥१४॥