कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बकः ४८९ और लौटकर उसने राजकर्मचारियों को आदेश दिया कि वे नगर में सुनाने के लिए आश्चर्यजनक इस घोषणा का डिंडिम-घोष के साथ कर दें ॥५२॥ 'कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिययुवक जिसने कनकपुरी नाम की नगरी देखी हो, वह राज- दरबार में उपस्थित हो जाय राजा उसे अपनी कन्या और युवराज-पद देना ही देंगे' ॥५३॥ सारे नगर में व्यापक रूप से आश्चर्यजनक यह घोषणा होने लगी ॥५४॥ आज कनकपुरी की यह क्या घोषणा की जा रही है, जो हम वृद्धों ने भी कभी न देखी और सुनी ॥५५॥ नगर-निवासी वृद्धजन इस घोषणा को सुनकर परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगे। नगर में एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सका कि मैंने वह कनकपुरी देखी है ॥५६॥ इतने में ही उस नगर-निवासी बलदेव के पुत्र शक्तिदेव ने भी यह घोषणा सुनी ॥५७॥ वह व्यसनी युवक उस समय जूए में दरिद्र हो चुका था। वह राजकुमारी की प्राप्ति के समाचार से उत्साहित होकर सोचने लगा ॥५८॥ मैं जूए में सब कुछ हार चुका हूँ अतः अब मैं पिता के घर में प्रवेश नहीं पा सकता और न वेश्या के घर में ही जाकर रह सकता हूँ ॥५९॥ इसलिए अब मैं कहीं का भी न रहा अतः अब अवसर है कि मैं झूठ बोलूँ कि मैंने वह नगरी देखी है ॥६०॥ मुझे झूठा कौन समझेगा। वह नगरी किसने देखी है। अतः सम्भव है, राजकुमारी से मेरा समागम होजाय ॥६१॥ ऐसा सोचकर उसने राजपुरुषों के समीप जाकर झूठ कह दिया कि मैंने कनकपुरी नगरी देखी है ॥६२॥ तब उन्होंने कहा—आओ द्वारपाल उसके पास चलें। उनके ऐसा कहने पर उनके साथ वह द्वारपाल के पास गया ॥६३॥ घोषणा करनेवालों ने कहा कि 'इसने कनकपुरी देखी है'। यह सुनकर द्वारपाल उस स्वागत-सत्कार के साथ राजा के पास ले गया ॥६४॥ राजा के सम्मुख उपस्थित होकर भी उस धूर्त जुआरी ने ऐसे ही मिथ्या भाषण किया। सच है, द्यूत में हारे हुए धूर्त जुआरी के लिए कौनसा कार्य दुष्कर है ॥६५॥ १२