कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 876 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक २३ यह धूतवर बालक उत्पन्न हुआ है और वर्ष उपाध्याय से विद्या प्राप्ति कर संसार में व्याकरण की प्रतिष्ठा करेगा॥६९॥ यह बालक नाम से वररुचि होगा। संसार में जो भी अच्छा होगा वह इसे अच्छा लगेगा इसीलिए इसका नाम वररुचि होगा। इतना कहकर आकाशवाणी समाप्त हो गई॥७०॥ इसलिए जैसे जैसे यह बालक बड़ा हो रहा था वैसे ही वैसे मुझे रात-दिन यह चिन्ता सता रही थी कि वह वर्ष उपाध्याय कहाँ होगा॥७१॥ आज तुमलोगों के मुख से यह वृत्तान्त सुनकर मुझे अत्यन्त सन्तोष हुआ। अतः तुम दोनों इसे वर्ष के समीप ले जाओ। यह तुम्हारा भाई है। कोई हानि नहीं॥७२॥ मेरी माता के ऐसे वचन को सुनकर प्रफुल्लित व्याडि और इन्द्रदत्त ने वह रात एक क्षण के समान व्यतीत की॥७३॥ प्रातःकाल व्याडि ने उत्सव करने के लिए अपना धन मेरी माता को दे दिया और मुझे वेदाध्ययन के योग्य बनाने के लिए स्वयं ही मेरा उपनयन-संस्कार किया जिससे मैं योग्य बनकर विद्याध्ययन कर सकूँ॥७४॥ तब किसी प्रकार आँसुओं को रोककर मेरी माता ने मुझे आज्ञा दी। साथ ही मेरे अत्यन्त उत्साह को देखकर मेरी माता का शोक कम हो गया॥७५॥ मेरी कुमारावस्था को माता का अनुग्रह समझकर व्याडि और इन्द्रदत्त मुझे लेकर उस कौशाम्बी नगरी से शीघ्र चल पड़े॥७६॥ "इसके पश्चात् यथासमय हमलोग वर्ष गुरु के घर पहुँचे और उन्होंने भी मूर्तिमान् स्कन्द के प्रभाव के समान मुझ बाल हुए समझा॥७७॥ एक शुभ दिन को वर्ष उपाध्याय ने पवित्र भूमि में बैठकर और हमलोगों को आगे बैठाकर दिव्य वाणी में ओंकार का उच्चारण किया॥७८॥ ओंकार का उच्चारण करते ही कार्तिकेय की कृपा से सांगोपांग वेद उपस्थित हो गये और तब उपाध्याय हम लोगों को पढ़ाने को उद्यत हुए॥७९॥ गुरु का एक बार कहने से उसे मैं स्मरण कर लेता था दूसरी बार के कहने पर व्याडि और तीसरी बार के कहने पर इन्द्रदत्त ग्रहण करते थे॥८०॥ अध्ययन प्रारम्भ होने पर, वर्ष के मुख से निकलती हुई उस अपूर्व दिव्य ध्वनि को सुनकर फिर 'यह क्या है' इस प्रकार आश्चर्य के साथ वर्ष उपाध्याय के घर पर चारों ओर से आकर एकत्र एवं स्तुति करते हुए ब्राह्मणगण प्रणामों से उनकी अर्चना करने लगे॥८१॥