कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बक ५१३ उसे आते देखकर वे ब्राह्मण मठ के ऊपर भाग गये। सच है, अफवाहों से भीत व्यक्तियों में विचार करने का सामर्थ्य नहीं होता॥२१९॥ यह देखकर मन्द ही हँस हरस्वामी ने मठ के ऊपर चढ़े हुए ब्राह्मणों में से एक-एक का नाम लेकर बुलाया और कहा॥२२०॥ 'अरे ब्राह्मणो! यह क्या मूढ़ता तुममें आ गई है। क्या तुम परस्पर नहीं देख रहे हो कि मैंने कितने बच्चे कहाँ खाये ? ॥२२१॥ यह सुनकर जब सभी जाँच करने लगे तब देखा कि सभी के बच्चे जागते खेल रहे हैं॥२२२॥ तब सभी ब्राह्मण और वणिक विश्वस्त हुए और हरस्वामी की बात सच मानकर देखने लगे कि सभी के बालक जीवित हैं। तब वे कहने लगे कि 'हमने झूठे ही बेचारे तपस्वी को दूषित किया सभी के बच्चे तो जीवित हैं। तब किसके बच्चे इसने खाये ? ॥२२३-२२४॥ जब सभी एकस्वर से इस प्रकार कहने लगे तब निष्कलंक हरस्वामी उस नगर से जाने को उद्यत हुआ क्योंकि पहले उठाई गई अपनी निन्दा से उसका मन विरक्त हो गया था॥२२५॥ स्वतन्त्र विचारवाले मनस्वी का दुष्ट देश में रहने वाले विचारहीनों के साथ प्रेम कैसे हो सकता है ? तदनन्तर चरणों में गिरे हुए ब्राह्मणों और वणिकों के प्रार्थना करने पर किसी प्रकार हरस्वामी ने वहाँ रहना स्वीकार किया॥२२६-२२७॥ इस प्रकार सज्जनों के सच्चरित्रों को देखकर जलते हुए तथा उनकी नाना प्रकार से निन्दा करते हुए दुष्टजन सज्जनों को प्रायः झूठे कलंक लगा देते हैं। यदि उन्हें सचमुच ही कोई छोटा-सा भी अवसर मिल जाय तो वह उनके लिए जलती हुई आग में घी का-सा काम करता है॥२२८॥ इसलिए हे बेटी! यदि तू मेरे हृदय का काँटा निकालकर मुझे स्वस्थ देखना चाहती है, तो इस उमड़ते हुए नव यौवन में अपनी इच्छा से कुमारी नहीं रह सकती। यह दुष्ट लोगों के लिए निन्दा करने का सुलभ अवसर है' ॥२२९॥ राजा से इस प्रकार कही गई कनकरेखा अपने दृढ़ निश्चय के साथ फिर राजा से बोली कि 'जिस ब्राह्मण या क्षत्रिय युवक ने वह कनकपुरी देखी हो उसे शीघ्र ढूँढ़ो और मुझे उसके लिए दान कर दो। यह मैंने पहले ही कह दिया है' ॥२३०-२३१॥ ६५