कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextउसने उस शूली के नीचे सुन्दर आभूषणों से सुशोभित एक रोती हुई स्त्री को देखा। वह अपूर्व रमणी सर्वांग सुन्दरी थी मानों कृष्णपक्ष के बीतने के कारण चन्द्रमा का अस्त हो जाने पर चाँदनी के समान रजनीचरणी चिता पर चढ़कर सती होने के लिए आई हो॥१३९-१४०॥ 'हे माता तू कौन है, यहाँ क्यों रो रही है और इस प्रकार क्या बैठी है?'—इस प्रकार अशोकदत्त के प्रश्न करने पर वह स्त्री बोली—'मैं शूली पर चढ़े हुए इस पुरुष की अभागिन स्त्री हूँ। इसके साथ सती होने का निश्चय करके यहाँ बैठी हूँ। कुछ समय तक इसके प्राणों के निकलने की प्रतीक्षा कर रही हूँ। तीन दिन बीत जाने पर भी इसके प्राण नहीं निकले हैं॥१४१-१४३॥ यह बार-बार पानी माँगता है। मैं पानी लाई भी किन्तु ऊँची शूली पर लटके हुए इसके मुँह तक नहीं पहुँच पा रही हूँ'॥१४४॥ स्त्री की बातें सुनकर वीर अशोकदत्त बोला—'राजा ने मेरे हाथों यह जल भेजा है। अब तू मेरी पीठ पर पैर रखकर इसके मुख में यह जल डाल दे। आपत्ति के समय पुरुष का स्पर्श स्त्री के लिए दूषित नहीं है ॥१४५-१४६॥ यह सुनकर और उसकी बात मानकर वह स्त्री पानी लेकर, शूली की जड़ में नीचे मुँह किये हुए अशोकदत्त की पीठ पर दोनों पैर से चढ़ गई॥१४७॥ कुछ ही समय पश्चात् उसने भूमि पर और अपनी पीठ पर रक्त की बूँदों के गिरने से शङ्कित हो मुँह उठाकर ऊपर देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह स्त्री शूली पर चढ़े हुए उस पुरुष का मांस कटार से काटकर खा रही है॥१४८-१४९॥ उस स्त्री की इस प्रकार विकृति को देखकर उस वीर ने उसे पछाड़ने के लिए उसके पैर पकड़े जिनमें पैरों का आभूषण (पायजेब) बज रहा था॥१५०॥ वह स्त्री भी पैरों को छुड़ाकर और अपनी माया से आकाश में उड़कर अदृश्य हो गई॥१५१॥ पैरों को छुड़ाते समय अशोकदत्त के बलपूर्वक खींचने पर उसके एक पैर का पायजेब उसी अशोकदत्त के हाथ में ही रह गया॥१५२॥ और, दुर्जनों की संगति के समान प्रारम्भ में अच्छी मध्य में सन्तापकारिणी और अंत में घोर विकारवाली वह स्त्री हाथ से निकल गई॥१५३॥