कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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देखकर वह अपारयुक्त आश्चर्य और सन्ताप करने लगा॥१५४॥ किन्तु अपने हाथ में उसके दिव्य पायजेब को देखकर प्रसन्न भी हुआ। तदनन्तर वह अशोकदत्त पायजेब हाथ में लेकर श्मशान से घर आया और प्रातःकाल स्नान करके राजभवन को गया॥१५५॥ 'क्या उस शूली पर चढ़े हुए को तुमने पानी दिया ?' —इस प्रकार पूछते हुए राजा को उसने 'हाँ' कहकर वह पायजेब भेंट किया॥१५६॥ 'यह कहाँ से मिला ?' —इस प्रकार प्रश्न करते हुए राजा को उसने रात की अद्भुत और भीषण घटना कह सुनाई॥१५७॥ इस प्रकार उसके असाधारण महाबल को जानकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उस दिव्य आभूषण को लेकर रनिवास में गया। उसे महारानी को देते हुए उसने रात का सारा वृत्तान्त रानी से कह सुनाया॥१५८-१५९॥ यह सब सुनकर और उस दिव्य आभूषण को देखकर रानी अशोकदत्त की प्रशंसा करती हुई मन में अत्यन्त प्रसन्न हुई॥१६०॥ तब राजा ने रानी से कहा—'देवि यह अशोकदत्त जाति से विद्या से और अपने सच्चे स्वरूप से बड़ों में बड़ा है। अतः यदि यह मेरी भव्य बेटी मदनलेखा का पति हो तो अच्छा हो। यह मेरा विचार है'॥१६१-१६२॥ वर के ये ही गुण देखे जाते हैं न कि क्षण में नष्ट होनेवाली चंचल लक्ष्मी। इसलिए उस उत्तम धीर पुरुष को मैं कन्या देता हूँ॥१६३॥ यह सुनकर आदर के साथ उसका समर्थन करती हुई रानी ने कहा—'यह उचित है। यह युवा अपनी कन्या के सर्वथा अनुरूप और योग्य है। वह कन्या भी मधु-उद्यान में उसे देखकर उसपर आसक्त हो चुकी है। इसके बिना वह शून्य-हृदय होकर न कुछ सुनती है और न कुछ देखती ही है॥१६४-१६५॥ उसकी सखी से यह जानकर चिन्ता करती हुई मैं सो गई और रात बीतने पर (उषःकाल में) स्वप्न में किसी दिव्य स्त्री द्वारा मानों इस प्रकार कही गई। 'बेटी इस मदनलेखा को दूसरे के लिए न देना यह अशोकदत्त की पूर्वजन्म की अर्जित पत्नी है'॥१६६-१६७॥ यह सुनकर जागकर और बहुत ही सबेरे के उस स्वप्न में विश्वास कर, मैं बेटी को धीरज भी दे आई हूँ॥१६८॥ ६८