भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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प्रथम लम्बक ३५ उस राजा पुत्रक को देखकर पाटली की आँखों में लज्जा और आश्चर्य का संयम होने लगा। परपुरुष को देखकर लज्जा और उसका ऐसे अवसर पर वहाँ उपस्थित होना आश्चर्य का कारण था ॥६६॥ इसके अनन्तर वार्तालाप और गन्धर्व-विवाह हो जाने पर दोनों में परस्पर प्रीति बढ़न लगी किन्तु रात यही बड़ी अर्थात् रात समाप्त हो गई ॥६७॥ रात्रि के अन्तिम प्रहर में वह राजा पुत्रक उत्कण्ठित वधू (पाटली) से कहकर तल्लीन भाव से उस वृद्धा के पुराने घर पर लौट आया ॥६८॥ इस प्रकार पुत्रक प्रत्येक रात्रि में पाटली के यहाँ यातायात करता रहा। किन्तु एक बार पाटली के रक्षकों ने उसके सम्भोग-चिह्नों को देख लिया ॥६९॥ रक्षकों (पहरेदारों) ने सारी परिस्थिति राजा से बता दी। राजा ने पाटली के भवन में रात्रि को देखने के लिए एक स्त्री-जासूस को नियुक्त कर दिया ॥७०॥ इस प्रकार एक दिन उस गुप्त स्त्री ने पहचान के लिए, सोये हुए पुत्रक के वस्त्र में पाटली की महावर लगा दी ॥७१॥ प्रातःकाल उस जासूस स्त्री ने राजा को बताया और राजा ने भी अपने दूतों को उसे पकड़ने के लिए भेज दिया। दूतों ने उस पुराने घर में महावर लगे कपड़े के गुण से उसकी पहचान करके वृद्धा के घर पर पुत्रक को पकड़ लिया ॥७२॥ दूत पुत्रक को पकड़कर उसे राजा के पास ले आये। किन्तु पुत्रक ने जब राजा को क्रुद्ध होते हुए देखा तब खड़ाऊँ के प्रभाव से वह आकाश-मार्ग से पाटली के घर में पहुँच गया ॥७३॥ उसने पाटली से कहा- हमलोग पकड़ गये। तुम उठो, खड़ाऊँ के प्रभाव से निकल भागते हैं। ऐसा कहकर और पाटली को गोद में उठाकर पुत्रक आकाश-मार्ग से निकल गया ॥७४॥ तदनन्तर गंगातट के समीप आकाश-मार्ग से उतरकर पुत्रक ने थकी हुई पाटली को उस पात्र के प्रभाव से मिलनेवाले विविध भोजन से प्रसन्न किया ॥७५॥ पाटली ने पुत्रक के प्रभाव को देखकर प्रार्थना की और उसके प्रार्थनानुसार पुत्रक ने उस छड़ी से चतुरंगिणी सेना-सहित जमीन पर एक नगर का नक्शा बनाया ॥७६॥ छड़ी से लिखे गये और सचमुच बने हुए उस प्रभावशाली नगर में वह पुत्रक राजा बनकर बैठा और अपने प्रभाव से श्वशुर (पाटली के पिता) को वश में करके समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का शासक बन गया ॥७७॥ इस प्रकार यह दिव्य नगर पुरस्वामियों-सहित माया से रचा गया जो पाटलिपुत्र नाम से लक्ष्मी और सरस्वती का क्षेत्र हुआ" ॥७८॥ वररुचि ने कहा- हे काणभूते इस प्रकार उपाध्याय वर्ष के मुख से यह अपूर्व और विचित्र कथा सुनकर हम सब आश्चर्य में आनन्दित हुए ॥७९॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के प्रथम लम्बक का तृतीय तरङ्ग समाप्त।