कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक १७७ पहले उसके सिर को गर्म घी से चुपड़कर दोपहर की कड़ी गर्मी में बहुत देर तक उसे सुखाना चाहिए। तब उसके कान में बाँस की पोली नली समाकर और दूसरा सिरा जल से भरे घड़े के ऊपर रखे हुए मिट्टी के पात्र में लगा देना चाहिए। तब पसीना और धूप की गर्मी से व्याकुल अतएव ठण्डक चाहते हुए वे कीड़े कान के मार्ग से बाँस की नली में होकर ठंडे घड़े में गिर जायेंगे। इस प्रकार वह राजा महारोग से छुटकारा पा जायगा' ॥१४४-१४७॥ राक्षसी बच्चों को इस प्रकार कहकर चुप हो गई और उसी वृक्ष के खोखले में बैठी हुई कीर्तिसेना ने सब सुन लिया॥१४८॥ यह सुनकर वह सोचने लगी कि 'यदि मैं इस विपत्ति से बच गई तो जाते ही इस युक्ति से राजा को बचा लूँगी' ॥१४९॥ वह इस जंगल के किनारे रहकर बहुत कम मार्ग-शुल्क लेकर जंगल से जानेवालों की रक्षा करता है। इसी सुविधा के कारण सभी व्यापारी इसी मार्ग से आते-जाते हैं॥१५०॥ मृत समुद्रसेन ने भी कहा था कि मेरा पति इसी मार्ग से आवेगा॥१५१॥ इसलिए जंगल के किनारे वसुदत्तपुर को जाती हूँ और वहाँ राजा को नीरोग करके पति के आगमन की प्रतीक्षा करती हूँ ॥१५२॥ ऐसा सोचते हुए उसने कठिनाई से वह रात व्यतीत की। प्रातःकाल राक्षसी के चले जाने पर वह खोखले से बाहर निकली॥१५३॥ पुरुष-वेष धारण करके जंगल के मध्य से जाती हुई उसने अपराह्न में एक ग्वाले को देखा॥१५४॥ एक ओर उसकी सुकुमारता और दूसरी ओर लम्बे और बीहड़ जगली मार्ग को देखकर दयार्द्र होते हुए ग्वाले से कीर्तिसेना ने पूछा—'बताओ यह कौन-सा देश है? ॥१५५॥ ग्वाले ने कहा—'यह राजा वसुदत्त का वसुदत्तपुर है जो सामने दीख रहा है॥१५६॥ यहाँ का राजा भी रुग्ण है और मरणासन्न है। यह सुनकर कीर्तिसेना ने कहा—'यदि मुझे कोई उस राजा के पास ले जावे तो मैं उसकी बीमारी दूर करना जानता हूँ ॥१५७-१५८॥ यह सुनकर ग्वाला बोला—मैं उसी नगर में जा रहा हूँ। तुम मेरे साथ आओ मैं तुम्हारे लिए यत्न करता हूँ ॥१५९॥