कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७४१ इस कारण क्षौरकर्म करते समय सुवृत्त और अच्छे लोहे का बना हुआ मेरा उस्तरा भी उन दाँतों से टकराकर टूट गया ॥१६३॥ इस प्रकार यदि मेरा उस्तरा पग-पग पर टूटता रहेगा तो मैं प्रतिदिन नया उस्तरा कहाँ से लाऊँगा ? इसलिए अब राजा के घर से मेरी जीविका नष्ट हो गई—यही कारण मेरे रोने का है ॥१६४॥ मेरे इस प्रकार कहने पर मेरी पत्नी ने रात को सोये हुए राजा के मुखद्वार में उगे हुए दाँतों के आश्चर्य को देखने का विचार किया ॥१६५॥ किन्तु संसार के प्रारम्भ से ही निश्चित इस असत्य को मेरी पत्नी ने नहीं समझा। मूर्खों की बातों से चतुर स्त्रियाँ भी ठगी जाती हैं ॥१६६॥ तदनन्तर राजा रात को आकर और मेरी पत्नी का निश्शंक उपभोग करके मेरी डाइन वाली बात का स्मरण करता हुआ झूठे ही सो गया ॥१६७॥ तदनन्तर मेरी पत्नी ने उसे सोया हुआ जानकर, दाँतों को देखने के लिए धीरे-धीरे उसके मुखद्वार की ओर हाथ बढ़ाया ॥१६८॥ उसका हाथ मुखद्वार पर पहुँचते ही सोने का बहाना करनेवाला राजा एकाएक उठकर डाइन ! डाइन ! चिल्लाता हुआ भागा ॥१६९॥ तब से राजा ने डर से मेरी स्त्री को त्याग दिया और मेरी स्त्री एकमात्र मेरे अधीन होकर सुखपूर्वक रहने लगी ॥१७०॥ इस प्रकार, पहले मैंने अपनी बुद्धि के बल पर अपनी स्त्री को राजा से छुड़ाया था। उस कपट-तपस्विनी से ऐसा कहकर वह नापित फिर बोला —'इसलिए हे आर्य, यह तुम्हारा कार्य बुद्धि से किये जाने योग्य है। इसे जिस प्रकार करना है, वह भी सुनो' ॥१७१-१७२॥ रनिवास के किसी वृद्ध नौकर को ठीक करना चाहिए जो राजा से एकान्त में यह कहे कि तेरी यह पत्नी कदलीगर्भा डाइन है ॥१७३॥ यह जंगली स्त्री है, इसका अपना सगा-सम्बन्धी कोई नहीं है। इसी प्रकार अन्यान्य नौकर सेवक आदि भी धन आदि के लोभ से फोड़े जा सकते हैं। कौन ऐसा काम है जो प्रलोभन में फँसकर न किया जा सके ? ॥१७४॥ तदनन्तर जब राजा के मन में शंका उत्पन्न हो जाय तो रात के समय किसी शव के कटे हाथ-पैर आदि कदलीगर्भा के शयनागार में रखवा दिये जायें, प्रातःकाल यह सब देखकर राजा भय से स्वयं उसे छोड़ देगा ॥१७५-१७६॥ इस प्रकार सौत के न रहने से महारानी सुखी हो जायगी। मुझे बहुत मानने लगेगी और हमें भी धन मिलेगा ॥१७७॥