कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७६५ श्रावस्ती नाम की एक नगरी है। उसमें पहले प्रसेनजित् नाम का राजा राज्य करता था। वहाँ एक बार एक कोई अनूक्त ब्राह्मण आया ॥१३३॥ वह शूद्र का अन्न नहीं खाता था। इसलिए एक वैश्य ने उसे तपस्वी समझकर किसी ब्राह्मण के घर ठहरा दिया ॥१३४॥ धीरे-धीरे उसकी प्रसिद्धि होने पर उस ब्राह्मण के घर को अन्यान्य वैश्यों ने मूले अन्न और धन से भरपूर कर दिया ॥१३५॥ उस संग्रह से उस कंजूस ब्राह्मण ने एक सहस्र मुद्राएँ एकत्र कर लीं और जङ्गल में जाकर भूमि खोदकर उन्हें गाड़ दिया ॥१३६॥ और, प्रतिदिन वहाँ अकेला जाकर उस स्थान को वह देख आता था। एक दिन उसने उस स्थान को खुदा हुआ और मुद्रारून्य पाया ॥१३७॥ उस गड्ढे को मुद्रा-रहित देखकर हताश उस ब्राह्मण के हृदय में ही नहीं प्रत्युत दिशाओं में भी शून्यता फैल गई अर्थात् उसे सभी ओर अँधेरा दीखने लगा ॥१३८॥ तदनन्तर रोता विलाप करता हुआ वह ब्राह्मण वहाँ आया जहाँ ठहरा हुआ था। वहाँ के गृहस्वामी ब्राह्मण द्वारा पूछे जाने पर अपना सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया ॥१३९॥ और, वह अनशन करके तीर्थ में प्राण देने की इच्छा प्रकट करने लगा। यह जानकर वह उसका अन्नदाता वैश्य भी अन्य बनियों के साथ वहाँ आया ॥१४०॥ आकर उस ब्राह्मण से वह कहने लगा हे ब्रह्मन् ! धन के लिए क्या मरना चाहता है ? बलाहक-मेघ के समान धन आता है और चला जाता है ॥१४१॥ इस प्रकार अनेक बातों से सान्त्वना देने पर भी उस ब्राह्मण ने मरने का आग्रह न छोड़ा क्योंकि कंजूस के लिए धन की माया प्राणों से भी प्यारी और भारी होती है ॥१४२॥ तदनन्तर मरने के लिए तीर्थयात्रा करनेवाले उस ब्राह्मण को सुनकर प्रसेनजित् स्वयं उसके पास आया ॥१४३॥ और पूछा कि 'जहाँ तुमने मुहरें गाड़ी थीं वहाँ पर कोई चिह्न भी है' १४४॥ यह सुनकर उस ब्राह्मण ने कहा—'वहाँ पर एक छोटा-सा स्तूप (पेड़) है सम्भवत उसी की जड़ में मैंने वह धन गाड़ दिया था ॥१४५॥ यह सुनकर राजा ने उससे कहा—'मैं उस दैववश मुहरें दे दूंगा अथवा अपने कोष से तुम्हें दे दूंगा। इसलिए तुम प्राण न छोड़ो ॥१४६॥ ऐसा कहकर ब्राह्मण को मरने के प्रयत्न से रोककर और उस वैश्य के हाथ सौंपकर राजा अपने महल को चला गया ॥१४७॥