कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ८ ३ 'आप तो सब कुछ जानते हैं फिर भी आपके पूछने पर हमलोग कहते हैं'—इस प्रकार रहकर मन्त्रियों ने परस्पर निश्चय करके कहा—॥१९०॥ "युवराज राजा को चाहिए कि वह सबसे पहिले इन्द्रिय-रूपी घोडों पर चढ़कर काम क्रोध लोभ आदि भीतरी शत्रुओं को जीतकर, अन्य बाहरी शत्रुओं को जीतने के पहले इस प्रकार अपनी आत्मा पर ही विजय प्राप्त करे ॥१९१॥ जो आत्मविजय ही नहीं कर पाया वह स्वयं विवश या पराधीन दूसरों पर क्या विजय प्राप्त कर सकेगा ? ॥१९२॥ आन्तरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके जनपद रस आदि की उन्नति करनेवाले मन्त्रियों तथा अथर्ववेद को जाननेवाले चतुर एवं तपस्वी पुरोहित की नियुक्ति करे। तदनन्तर राजा को भय में क्रोध में लोभ में और धर्म में उन लोगों की कपट-परीक्षा करके उनके हृदयों को भली भाँति जानकर उन्हें योग्य कार्यों पर नियुक्त करे ॥१९३ १९४॥ इस प्रकार, उनकी बातों की भी परीक्षा करनी चाहिए कि वे आन्तरिक स्नेह से बातें करते हैं या स्वार्थ अथवा कपटपूर्ण होकर। पारस्परिक वार्तालाप से उनकी यह परीक्षा करनी चाहिए। सत्य बात पर प्रसन्न होना और असत्य बात पर दंड देना चाहिए। उनके चरित्रों का पता भी अलग-अलग गुप्तचरों द्वारा लगाना चाहिए। इस प्रकार, आँखें खोले रहकर चौतर्फे राज्य के कार्यों को देखते हुए, विरोधियों को उखाड़कर, कोष और सेना का बल संग्रह करके अपनी जड़ सुदृढ़ कर लेनी चाहिए ॥१९५ १९७॥ तदनन्तर प्रभाव उत्साह और मन्त्र —इन तीनो शक्तियों से युक्त होकर अपने और शत्रु के बलाबल को भली भाँति समझकर दूसरे देशों को जीतने की इच्छा करनी चाहिए ॥१९८॥ अत्यन्त विश्वासी नीति आदि शास्त्रा को जाननेवाले प्रतिभाशाली मन्त्रियों से मन्त्रणा करनी चाहिए। उनके निर्णयों को अपनी बुद्धि द्वारा कार्यान्वित करके राज्य के सभी अंगों को दृढ़ करना चाहिए ॥१९९॥ साम दाम आदि उपायों से योग और क्षेम की साधना करनी चाहिए और सन्धि विग्रह आदि छह् गुणों का प्रयोग करना चाहिए ॥२ ०० ॥ इस प्रकार आलस्य और प्रमाद-रहित होकर जो राजा अपने और पराये देश की चिन्ता करता है, वह सदा विजयी रहता है और किसी से जीता नहीं जा सकता ॥२०१॥