भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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मूर्ख सामान्य और लोभी राजा झूठे और अनुचित माप प्रदर्शित करनेवाले धूर्ती और ठगों द्वारा गड्ढे में गिरा-गिराकर भ्रष्ट कर दिया जाता है। इस प्रकार के स्वार्थयों से घिरे हुए मूर्ख राजा के पास बुद्धिमान् और श्रेष्ठ व्यक्ति उसी प्रकार नहीं जा सकते जिस प्रकार निपुण किसान द्वारा लगाई गई बाड़ को पारकर धान के खेत तक नहीं पहुँचा जा सकता ॥२ २-३ ॥।

ऐसा राजा धूर्तों का अन्तरङ्ग बन जाता है और अपना रहस्य प्रकट कर बैठता है। फलतः, वह उनके वश में हो जाता है। और, ऐसे मूर्ख जनभिन्न राजा से खिन्न होकर राज्यलक्ष्मी भाग जाती है ॥२ ४॥

इसलिए राजा को आत्मविजयी, उचित दंड देनेवाला और राजनीति आदि में विशेषज्ञ होना चाहिए। ऐसा होने पर प्रजा के प्रेम से वह राजा लक्ष्मी का निवास-स्थान का पात्र बन पाता है ॥२ ५॥

राजा शूरसेन और उसके मन्त्रियों की कथा

प्राचीन समय में शूरसेन नाम का एक राजा था जो एकमात्र सेवको पर विश्वास किया करता था। वे सेवक एक दल बनाकर राजा को वश में करके उसे चूमा करते थे ॥२ ६॥

जिस योग्य सेवक को राजा कुछ देना भी चाहता था मन्त्रिगण उस एक तिनका भी नहीं देन देते और जो उनके निजी चापलूस नौकर थे उन्हें वे स्वयं भी देत और राजा द्वारा भी दिलाते थे ॥२ ७-८ ॥

यह सब देखकर और उन धूर्तों के दल को समझकर राजा ने अपनी बुद्धि से उनमे परस्पर फूट उत्पन्न करा दी ॥२ ९॥

फूट के कारण उन चुगलखोर सेवकों के पृथक हो जाने पर अन्य अच्छे और सुधी व्यक्तियों से युक्त वह राजा भली भाँति शासन करने लगा ॥२१० ॥

हरिदत्त नाम का एक नीतिज्ञ और साधारण राजा था उसने अपने महल मन्त्री रखे थे। सुदृढ वित्त और बल का संग्रह भी पर्याप्त किया था। वह प्रजा को अपने प्रति अनुरक्त करके जैसा चाहता था वैसा करता था। इसी कारण वह एक चक्रवर्ती राजा के आक्रमण करने पर भी पराजित न हो सका ॥२११ २१२॥

इसलिए विचार और चिन्तन के अतिरिक्त राज्य का सार और क्या हो सकता है? इतना कहकर अपनी-अपनी सम्मति देकर गोमुख आदि मन्त्री चुप हो गये ॥२१३॥

नरवाहनदत्त ने उनके विचारो पर श्रद्धा प्रकट करते हुए कहा— पुरुष का कर्तृव्य चिन्तनीय होने पर भी दैवगति अचिन्तनीय है ॥२१४॥